कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तं हत्वाद्य महावाहो विजय़स्तव फल्गुन |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तं हनिष्यसि चेदद्य तन्नः श्रेय़ो भविष्यति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
तं हन्युः काष्ठलोष्टैर्वा दहेय़ुर्वा कटाग्निना |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तं हस्तिकक्ष्याप्रवरं च वाणैः; सुवर्णमुक्तामणिवज्रमृष्टम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
तं हि दृष्ट्वा महेष्वासं निरश्वं पतितं क्षितौ |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
तं हि विद्धं तथा दृष्ट्वा सौभद्रेण यशस्विना |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
तं हि वीरं महेष्वासाः सौभद्रप्रमुखा रथाः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
तं हीनपर्णं पतिताग्रशाखं; विशीर्णपुष्पं प्रसमीक्ष्य वाय़ुः |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तं हीय़मानं विज्ञाय़ भीमसेनो महावलः |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तं ह्रदं प्रत्यपद्यन्त यत्र दुर्योधनोऽभवत् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तं ह्रदं प्राविशच्चापि विष्टभ्यापः स्वमाय़या ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवय़त् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
तक्षकं पन्नगश्रेष्ठं भृशं शोकपराय़णाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्राप्स्येऽहं सहवान्धवम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
काश्यप उवाच
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्ते वै भविष्यति ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ |
१४५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तक्षकस्तु न तत्रासीत्सर्पराजो महावलः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसा सादय़िष्यति ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
तक्षकस्य कुले जातान्प्रवक्ष्यामि निवोध तान् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
तक्षकेण च नागेन तथैवैरावतेन च ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तक्षकेण नरेन्द्रेन्द्र येन ते हिंसितः पिता |
१८५ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
काश्यप उवाच
तक्षकेण भुजङ्गेन धक्ष्यते किल तत्र वै ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
तक्षत्यात्मानमेवैष वनं परशुना यथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
तक्ष्णश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
तच्च कर्म महावाहो सत्यवत्यै न्यवेदय़म् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च कालकृतं धीमानन्वमन्यत स प्रभुः ||
५१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वमोदत ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च क्रोधः स्वरूपेण पिठरं पर्यवर्तय़त् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
तच्च क्षेत्रं महानात्मा पञ्चविंशोऽधितिष्ठति ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च घोरं महद्युद्धं भीष्मार्जुनसमागमे ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च ज्ञातिवधं घोरं संस्मरन्तः पुनः पुनः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीह सुखावहम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तच्च तस्मै पुनर्दद्यां यद्यत्स मनसेच्छति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तच्च तां च ददात्येव न शुल्कं विक्रय़ो न सः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च ते कथय़िष्यामि युधिष्ठिर निवोध मे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च ते लोमशः सर्वं कथय़िष्यत्यसंशय़म् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च तेभ्यः समाख्याय़ सहितस्तैः समाविशत् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
तच्च दद्यान्नरो नित्यं य इच्छेद्भूतिमात्मनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च दिव्यं धनुःश्रेष्ठं व्रह्मणा निर्मितं पुरा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
भीष्म उवाच
तच्च दुष्प्रापमिह वै महेन्द्रवचनं यथा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
तच्च दृष्टं भगवता व्रह्मणा परमेष्ठिना ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च नाकरवं कृष्ण नृशंसा जीवितप्रिय़ा |
२४ क