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आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
स चक्रं क्षुरपर्यन्तमपश्यदमृतान्तिके |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
स चक्रचरलोकानां सदृशीं प्राप्नुय़ाद्गतिम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षुं च हुताशनम् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
स चक्ररक्षानथ पादरक्षा; न्पुरःसरान्पृष्ठगोपांश्च सर्वान् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
स चक्ररेणूज्ज्वलशोभिताङ्गो; वभावतीवोन्नतचक्रपाणिः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
स चक्रे तात लोकानां विनाशाय़ महामनाः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
स चक्रे वसुधां कीर्णां शवलैः कुसुमैरिव ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
स चक्षुर्विवृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
स चक्षुष्मान्समभवद्गौतमश्चाभवत्पुनः ||
५० ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ||
३१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
स चचार वहून्मार्गानभीतः पातय़न्गजान् |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
स चचार सहामात्यो मृगय़ां गहने वने |
५ क
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
स चतुर्थे ततो वर्षे सङ्गम्य सह भार्यया |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
स चतुर्दश वर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
स चतुर्भिर्महेष्वासैः पाण्डवानां महारथैः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
स चरन्दक्षिणं पार्श्वं रम्यं हिमवतो गिरेः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
स चरन्विविधान्मार्गान्मण्डलानि च भागशः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
स चर्मादत्त कौन्तेय़ो जातरूपपरिष्कृतम् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
स चागम्य वनप्रस्थं यमुनाय़ां जहार ताम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भृगुरु उवाच
स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
स चाग्निर्व्रह्म ||
६ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
स चातिष्ठद्रथोपस्थे वज्रहस्तनिभो युवा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
स चात्मक्रोधजो वह्निर्हाहेत्युक्त्वा निवारितः |
१२२ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
स चाद्भुतमहावीर्यो वज्रसंहननो युवा |
११ क
वन पर्व
अध्याय २८२
सावित्र्यु उवाच
स चाद्य दिवसः प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
स चाद्य पतितः शेते पृष्टेनावेदितस्तव |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
स चानिरुद्धः सृजते महात्मा; तत्स्थं जगत्सर्वमिदं विचित्रम् ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
स चानेन नृशंसेन धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान् |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
स चानेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
स चान्नं हन्ति तच्चान्नं स हत्वा हन्यते वुधः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
स चान्नाज्जाय़ते तस्मात्सूक्ष्म एव व्यतिक्रमः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
स चान्नाज्जाय़ते तस्मिन्सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
स चान्यैः सहितो राजन्सङ्ग्रामेऽष्टादशावरैः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
स चापक्रम्यतां युद्धाद्येनोपाय़ेन शक्यते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
स चापघोषस्तनितः शरधाराम्वुदो महान् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
धृतराष्ट्र उवाच
स चापरिमितप्रज्ञस्तच्छ्रुत्वा पार्थभाषितम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स चापि कः ||
१७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
स चापि कुरुमुख्यानामृषभः पाण्डवेरितान् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
स चापि केशौ हरिरुद्ववर्ह; शुक्लमेकमपरं चापि कृष्णम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मय़ा ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
स चापि च्यवनो व्रह्मन्भार्गवोऽजनय़त्सुतम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
स चापि तं तोमरेण जत्रुदेशे अताडय़त् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
स चापि तद्व्यदधात्सर्वमेव; ततः सर्वे सम्वभूवुर्धरण्याम् ||
३० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो नृपः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
स चापि तां प्राप्य मुदा युतोऽभव; न्न चान्यनारीषु मनो दधे क्वचित् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
स चापि तानभ्यवदत्प्रसन्नः; सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः |
६ क