chevron_left  अत्यद्भुतमिदंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्यामिततेजसः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यद्भुतमिदं तात त्वत्सकाशाच्छृणोम्यहम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
अत्यद्भुतमिदं पार्थ तव पश्यामि संय़ुगे |
१२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यद्भुतमिदं मन्ये पाण्डवेय़स्य विक्रमम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यद्भुतमिदं मन्ये वलं शौर्यं च सैन्धवे |
९ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
अत्यद्भुतमिदं मेऽद्य विचित्रं प्रतिभाति माम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
अत्यद्भुतमिदं राजन्दृष्टवानस्मि ते वलम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
अत्यद्भुतमिदं व्रह्मञ्श्रुतवानस्मि तत्त्वतः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २०६
युधिष्ठिर उवाच
अत्यद्भुतमिदं व्रह्मन्धर्माख्यानमनुत्तमम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रिय़ाणां महात्मनाम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
अत्यद्भुतानि ते दृष्ट्वा वासुदेवपुरोगमाः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
अत्यद्भुतेन विधिना दैवय़ोगेन भारत |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
अत्यन्तं श्रीमति कुले जातः प्राज्ञो वहुश्रुतः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुय़ोधनः ||
३८ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यन्तगुरुभक्तानामेषोऽञ्जलिरिदं नमः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्तदुःखिता कृष्ण किं जीवितफलं मम ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्तभक्तिमान्देवे एकान्तित्वमुपेय़िवान् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्तभावं नष्टास्ते भद्रं तुभ्यं नरर्षभ ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः सरकस्तस्य विश्रुतः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं तथागतम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं पराजितम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तवैरी पार्थानां सततं पापपूरुषः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तशत्रुरस्माकं येन दुःशासनः शरैः |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
अत्यन्तसुकुमारस्य राङ्कवाजिनशाय़िनः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तसुखसंवृद्धं धनेश्वरसुतोपमम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तसुखसंवृद्धस्त्वं च युद्धविशारदः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
अत्यन्तसुखसंवृद्धो मानितश्च महारथैः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तापचितैः शूरैः फल्गुनः परवीरहा ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
अत्यन्तोपचितान्वा त्वं मानय़न्भ्रातृवान्धवान् |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
अत्यन्यानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्यान्पर्वतान्राजन्पुण्यो गिरिवरः शिवः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यन्यान्पुरुषव्याघ्रान्ह्रीमन्तमपराजितम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
अत्यन्यान्पृथिवीपालान्पृथिव्यामधिराज्यभाक् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यन्यान्वलवानासीद्धृतराष्ट्रो महीपतिः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
अत्यराजत तेजस्वी शक्रो देवगणेष्विव ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यरिच्यत तासां तु रोहिणी रूपसम्पदा ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
अत्यरिच्यत दारिद्र्यं राज्यादपि गुणाधिकम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अत्यरोचत तान्सर्वान्धृष्टद्युम्नः समागतान् |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
अत्यरोचत सौभद्रस्तव सैन्यानि शातय़न् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
अत्यरोचश्च भूतात्मन्भास्करं स्वेन तेजसा ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यर्कानलदीप्तं तत्स्थानं विष्णोर्महात्मनः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
अत्यर्जुनं शिनेः पौत्रो युध्यते भरतर्षभ ||
२८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
अत्यर्थं कोपनो राजा जातवैरश्च पाण्डुषु |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादय़ेद्दैवतान्यपि ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
अत्यर्थं प्रतिगृह्याहमस्त्रेष्वेव व्यवस्थितः ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
अत्यर्थं वलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
अत्यर्थं वा प्रनष्टास्ते प्राप्ता वापि यमक्षय़म् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्यर्थं शिशुमांसेन सम्प्रहृष्टा दुरासदा ||
२९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
अत्यर्थमकरोद्रौद्रं भीमसेनोऽत्यमर्षणः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते न वा भुङ्क्ते कदाचन ||
९ ख