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स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
संय़ोगा विप्रय़ोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ोगा विप्रय़ोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ोगा विप्रय़ोगाश्च जातानां प्राणिनां ध्रुवम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
संय़ोगानां क्षय़ं दृष्ट्वा युगानां च विशेषतः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
संय़ोगे विप्रय़ोगान्ते को नु विप्रणय़ेन्मनः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
संय़ोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः |
११६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
संय़ोगो विप्रय़ोगश्च तन्निवोधत सत्तमाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
संय़ोगो विप्रय़ोगश्च पर्याय़ेणोपलभ्यते ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
संय़ोगो वै प्रीतिकरः संसत्सु प्रतिदृश्यते |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
संय़ोज्य तपसात्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहिनीम् |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ोज्य विदुरस्तस्मिन्दृष्टिं दृष्ट्या समाहितः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
संय़ोज्यार्थैर्भृत्यजनं च सर्वं; ततः समुत्सृज्य यय़ौ नरेन्द्रः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
संय़ोज्यार्थैस्तथा धर्मैरश्वैस्तैः समय़ोजय़त् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
सकचग्रहणी चैव सोल्कालातावपोथिका ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सकचग्रहविक्षेपाः सतैलगुडवालुकाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सकम्पनर्ष्टिनखरा मुसलानि परश्वधाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
सकर्णकेन शिरसा शक्याश्छेत्तुं विजानता ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सकर्णसौवलः सङ्ख्ये विनाशं समुपेष्यसि ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
सकर्णा वा हते पार्थे सार्जुना वा हते मय़ि ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च ||
८१ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
सकलद्वीपवासांश्च सप्तद्वीपे च ये नृपाः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
सकवन्धश्च परिघो भानुमावृत्य तिष्ठति ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
सकवन्धस्तथादित्ये परिघः समदृश्यत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सकाननाः साद्रिचय़ाश्चकम्पुः; प्रविव्यथुर्भूतगणाश्च मारिष |
४९ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
सकामाय़ाः सकामेन निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
सकारणं तथा तीर्थेऽतीर्थे वा प्रतिपादनम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
सकिंनरगणावासां वानरर्क्षनिषेविताम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
सकिङ्किणीकजालेन महता चारुदर्शनः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
सकिरीटं महीं प्राप्य वभौ ज्योतिरिवाम्वरात् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सकुठाराः सकुद्दालाः सतैलक्षौमसर्पिषः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं तद्ददृशे पतमानं शिरो रथात् |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं; भ्राजिष्णु वक्त्रं निचकर्त देहात् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं; भ्राजिष्णु वक्त्रं निचकर्त देहात् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सकुण्डलं भानुमदुत्तमाङ्गं; काय़ात्प्रकृत्तं युधि सव्यसाचिन् ||
४२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं शिरः काय़ाद्भ्राजमानमपाहरत् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
सकुण्डलं सकवचं दिव्यलक्षणलक्षितम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
सकुण्डलं सकवचं दीर्घवाहुं महारथम् |
१६० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं समुकुटं पद्मेन्दुसदृशप्रभम् |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं समुकुटं सुनसं स्वाय़तेक्षणम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं सिन्धुपतेः प्रभञ्जनसुतानुज |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलशिरस्त्राणं पूर्णचन्द्रोपमं तदा |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलशिरस्त्राणैर्वसुधा समकीर्यत ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलानां पततां शिरसां धरणीतले |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलानि स्रग्वीणि क्रुद्धश्चिच्छेद फाल्गुनिः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलानि स्रग्वीणि भूमावासन्सहस्रशः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलैर्मही छन्ना पद्मकिञ्जल्कसंनिभैः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
सकूलमूलवान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान् |
६६ क