सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
आहरिष्यन्ति राजानस्तवापि विपुलं धनम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
आहरिष्यामि तत्सत्रं सम्भाराः सम्भ्रिय़न्तु मे ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
आहरिष्यामि दारूणां निचय़ान्महतोऽपि च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
आहरेद्वेश्मतः किञ्चित्कामं शूद्रस्य द्रव्यतः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
आहरेय़ुर्हि मे येऽपि फलमूलमृगांस्तथा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रय़विक्रय़ी |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
ऋत्विज ऊचुः
आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप |
७ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
आहर्ता वाजिमेधस्य शतसङ्ख्यस्य पौरव |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
आहर्ता सर्वरत्नानां सर्वेषां नः सुखावहः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
आहर्तारं कलेस्तस्य जघानामितविक्रमः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ||
२६ ग
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः सञ्चिन्त्य सोऽसकृत् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आहवं पृष्ठतः कृत्वा कच्चिन्न निहतः परैः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
११५
युधिष्ठिर उवाच
आहवे क्षत्रिय़ाः सर्वे कथं केन च हेतुना ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
आहवे खं महाराज ददृशे पूरय़न्निव ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
आहवे निधनं कुर्याद्राजा धर्मपराय़णः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
आहवे निहतं दृष्ट्वा सैन्धवं सव्यसाचिना ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
आहवे निहतं शूरं न शोचेत कदाचन |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
आहवे ये न्यवर्तन्त वृकोदरमुखा रथाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युय़ुत्सतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
आहवेषु च ये शूरास्त्यक्त्वा मरणजं भय़म् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
आहवेषु पराँल्लोकाञ्जिगीषन्तो महावलाः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
आहवेष्वाहवश्रेष्ठ नेतृहीनेव नौर्जले ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
आहवेऽतिरथोऽतिष्ठज्ज्वलन्निव हुताशनः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
भीष्म उवाच
आहवेऽभिमुखाः केचिन्निहताः स्विद्दिवं गताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
आहारं कुरुते नित्यं सोऽमृतत्वाय़ कल्पते ||
७६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
आहारं केचिदिच्छन्ति केचिच्चानशने रताः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
आहारं चिन्तय़ामास कथं तुष्टो भवेदिति ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
आहारं निय़तं चैव देशे काले च सात्त्विकम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
आहारं सम्प्रय़च्छामि स्वय़ं च द्विजसत्तम ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
आहारं सा कृतवती मासि मासि नराधिप ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
श्वशुरावू ऊचतुः
आहारकालः सम्प्राप्तः क्रिय़तां यदनन्तरम् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आहारकाले मतिमान्परिव्राड्जनमेजय़ |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
आहारनिय़मं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
आहारनिय़मेनास्य पाप्मा नश्यति राजसः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जाय़ते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
आहारप्रभवाः प्राणा मनो दुर्निग्रहं चलम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
आहारमकरोन्नित्यं प्राणान्वेदांश्च धारय़न् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ||
२४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
आहारसञ्चय़ाश्चैव तथा कीटपिपीलिकाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय़ः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
आहारहेतोरन्नं वा भोक्तुमर्हसि व्राह्मण ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामय़प्रदाः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
आहारात्सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
आहारादि च सर्वं तत्तथैव प्रत्यवेदय़त् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
युधिष्ठिर उवाच
आहारान्कीदृशान्कृत्वा कानि जित्वा च भारत |
४२ क