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विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमतः पाण्डवान्दृष्ट्वा ज्वलतः पावकानिव |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
श्रीमता सात्वताग्र्येण शक्रेणेव धनुष्मता ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
श्रीमतां चापि जानासि राज्ञां धर्मं सनातनम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमती वहुला चैव तथैव वहुपुत्रिका ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
श्रीमत्स्ववभृथाग्र्येषु चतुर्षु प्रतिवन्धुषु |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
श्रीमदाकाशमभवद्भूय़ो मेघाकुलं यथा ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमद्धनुरुपादाय़ शरांश्चाशीविषोपमान् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमद्भिरात्मवद्भिर्हि वुद्धिमद्भिर्जितेन्द्रिय़ैः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
श्रीमद्राजपुरं नाम नगरं तत्र भारत |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जन्तं च ममोपरि ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
श्रीमन्तं पितरं राजा ददर्श जनमेजय़ः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५
सूत उवाच
श्रीमन्तमजरं दिव्यं सर्वलक्षणलक्षितम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
श्रीमन्तमाप्नुवन्त्यर्था दानं यज्ञस्तथा सुखम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमन्प्रीतेन मनसा सर्वं यावदनन्दन ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीमानिव महाशैलो मलय़ो मेघमालय़ा ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमान्गोविततं नाम वाजिमेधमवाप सः |
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीमान्दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽपि वीर्यवान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
श्रीमान्ध्वजः कर्ण धनञ्जय़स्य; समुच्छ्रितः पावकतुल्यरूपः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
श्रीमान्भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसंमतः |
४८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमान्महात्मा धर्मात्मा मुञ्जकेतुर्विवर्धनः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
श्रीमान्महावलस्तुष्टो यस्त्वं धर्ममवेक्षसे |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीमान्माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
श्रीमान्स यावद्भवति तावद्भवति पूरुषः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
श्रीरनन्तरमुत्पन्ना घृतात्पाण्डुरवासिनी |
३४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
श्रीर्ध्रुवा चापि दक्षेषु ध्रुवो नाराय़णे जय़ः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
श्रीर्मङ्गलात्प्रभवति प्रागल्भ्यात्सम्प्रवर्धते |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
श्रीर्हता पुरुषं हन्ति पुरुषस्यास्वता वधः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीवत्सधारी द्युतिमान्पीतवासा महाद्युतिः ||
११६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीवत्सधारी द्युतिमान्वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीवत्सवक्षा गोविन्दः प्रजापतिपतिः प्रभुः ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रिय़ाणां युधिष्ठिर |
४० क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
श्रीश्च राज्यं च दण्डश्च क्षत्रिय़ाणां द्विजोत्तम ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
श्रीश्च वुद्धिश्च तेजश्च विभूतिश्च प्रतापिनी |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्रह्मो उवाच
श्रीश्चैव रमते तेषु धारय़न्ति श्रिय़ं च ते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
श्रीसमृद्धं तदा दृष्ट्वा नारदं देवरूपिणम् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं कर्म महत्कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना |
७६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
श्रुतं चापि मय़ा भूय़ः कृष्णस्यापि विशां पते |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं चाश्रुतवत्कृत्वा प्राय़ाद्येन स सात्यकिः ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं तत्सर्वलोकेषु परमव्यसने यथा |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
अर्जुन उवाच
श्रुतं ते कुरुमुख्यस्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् |
१०० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मय़ाच्युत |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतं ते ज्ञानवृद्धानामृषीणां पुण्यकर्मणाम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं ते धृतराष्ट्रस्य सपुत्रस्य चिकीर्षितम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
श्रुतं ते न श्रुतं मन्ये मिथ्या वापि श्रुतं श्रुतम् |
१६५ क