उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
सम्पूज्याप्सरसः शक्रो विसृज्य च महामतिः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूज्यैनं यथाकालं भीष्मो वचनमव्रवीत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
सम्पूजय़ति साधूंश्च स राज्ञो धर्म उच्यते ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूजय़न्विक्रममर्जुनस्य; रेमे महीपालपतिः पृथिव्याम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
सम्पूर्णं पूरय़न्भूय़ो वलं पार्थस्य माधवः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
सम्पूर्णं योधमुख्यैश्च तथा दन्तिपदातिभिः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सम्पूर्णचन्द्राभमुखः पद्मपत्रनिभेक्षणः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
सम्पूर्णां पुरुषव्याघ्रैर्व्याघ्रैर्गिरिगुहामिव ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पूर्णां सर्वकामानामाहवे विजय़ैषिणः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सम्पूर्णे नवमे मासे जन्तोर्जातस्य मैथिल |
११८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पृच्छते धृतराष्ट्राय़ सञ्जय़; आचक्ष्व सर्वं यावदेषोऽनुय़ुङ्क्ते |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पृष्ट्वा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिरः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्पेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
सम्पेतुर्दिक्षु सर्वासु चर्माणि भरतर्षभ ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
सम्प्रकीर्णेन्द्रिय़ो लोके यः कामनिरतश्चरेत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रकृत्तोत्तमाङ्गाश्च पेतुरुर्व्यां महासुराः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे; पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्प्रक्षालनकालोऽय़ं लोकानां समुपस्थितः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
सम्प्रक्षालाश्मकुट्टाश्च दन्तोलूखलिनस्तथा ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालार्कानलसंनिभम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रगृह्य महावाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सम्प्रज्वलति सा भूय़ः समिद्भिरिव पावकः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वितः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सम्प्रति भवानुच्छिष्टः |
११२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रत्याचक्षते चैव आख्यास्यन्ति तथापरे |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रदत्तास्त्रशिक्षा वै परानीकविनाशिनी ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रदीपितसर्वाङ्गौ साय़कैस्तौ महारथौ |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रदीप्तां महोल्काभामशनीं मघवानिव |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रदीप्तास्त्रय़ो लक्ष्म्या महाध्वर इवाग्नय़ः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
सम्प्रदीप्तेषु देशेषु व्राह्मण्ये चाभिपीडिते |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रदुद्राव सङ्ग्रामात्तव पुत्रस्य पश्यतः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रद्रुतः क्रोधविषो व्यादितास्यशरासनः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
सम्प्रद्रुतमृगद्वीपिमहिषर्क्षसमाकुलम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रधार्य क्षमं वुद्ध्या ततस्त्वं योद्धुमर्हसि ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
सम्प्रधार्य सहामात्यैर्मन्त्रविद्भिर्महात्मभिः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रधावत्स्वनीकेषु मेदिनी समकम्पत ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
सम्प्रनष्टे कलौ राजन्सङ्ख्याय़ाथ फलान्युत ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२
सूत उवाच
सम्प्रनृत्तमिवाकाशं धारोर्मिभिरनेकशः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रमथ्येन्द्रिय़ग्रामं प्रनष्टा सह चेतसा ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रमथ्येन्द्रिय़ग्रामं प्रादुरासीन्मनोभवः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
सम्प्रमुह्यन्ति भूतानि राजदौरात्म्यतो नृप ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
सम्प्रमूढेषु वर्णेषु यद्यन्योऽभिभवेद्वली ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
सम्प्रमृद्य महत्सैन्यं यान्तं शैनेय़मर्जुनम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
सम्प्रमोदमलः कामो भूय़ः स्वगुणवर्तितः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
सम्प्रवृत्तमुदीर्णं च निगृह्णीय़ाद्द्विजो मनः ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
सम्प्रवृत्ते तु सङ्ग्रामे भावाभावौ जय़ाजय़ौ |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रसुप्ते यथा नक्तं वनराज्यौ सुपुष्पिते ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सम्प्रहर्षात्समाजग्मुर्द्रौपदेय़ांश्च सर्वशः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
सम्प्रहारं परं चक्रुर्देहपाप्मप्रणाशनम् ||
२ ख