chevron_left  निराशाःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
निराशाः समपद्यन्त पुत्रस्य तव जीविते ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
निराशाः सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधमजीविकाम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
निराशाः सिन्धुराजस्य जीवितं नाशशंसिरे ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
निराशान्यभवंस्तत्र जीवितं प्रति भारत ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
निराशाश्च जय़े तस्मिन्हते शल्ये महारथे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
निराशिषो जीवलोके क्षात्रे धर्मे व्यवस्थिताः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
निराशिषो निर्ममा वीतरागा; लाभालाभे तुल्यनिन्दाप्रशंसाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसञ्ज्ञिताः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
निराशीः सर्वभूतेषु निरासङ्गो निराश्रय़ः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
निराशीः स्यात्सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
निराशीःकर्मसंय़ुक्तं सात्वतं मां प्रकल्पय़ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
निराशीर्निर्ममो भूत्वा निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
निराशे पुत्रलाभाय़ सहसैवाभ्यगच्छताम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
निराशैरलसैः श्रान्तैस्तप्यमानैः स्वकर्मभिः |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
निराशो जीवितान्नूनमद्य राज्याच्च पाण्डवः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
निराशो जीविते त्वद्य राज्ये चैव धनञ्जय़ ||
९० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु च भविष्यसि ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
निराशोऽद्य दुरात्मासौ धार्तराष्ट्रो भविष्यति |
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः ||
५८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
निराहारतय़ा राजा मन्दप्राणविचेष्टितः |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जय़ते पुनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
निराहारस्तृतीय़ेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
निराहारस्य सुमहान्मम कालोऽभिधावतः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
निराहारा कृशा रूक्षा जटिला मलपङ्किनी |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
निराहारा भय़ादत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
निराहाराः प्रजाः शोच्याः शोच्यं राष्ट्रमराजकम् ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
सूत उवाच
निराहारान्कृशान्दीनान्गर्तेऽऽर्तांस्त्राणमिच्छतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
भीष्म उवाच
निराहारेण वसता दुःखितास्ते भुजङ्गमाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्युपागमत् |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
निरिङ्गश्चाचलश्चोर्ध्वं न तिर्यग्गतिमाप्नुय़ात् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
निरिन्द्रिय़स्यावीजस्य निर्द्रव्यस्यास्य देहिनः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
निरिन्द्रिय़ा अमन्त्राश्च स्त्रिय़ोऽनृतमिति श्रुतिः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
निरिन्द्रिय़ोऽभिमन्येत व्रणवानस्मि निर्व्रणः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
वसिष्ठ उवाच
निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुरेश्वर ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
निरीक्षते त्वां विपुलाय़तांसः; सुविस्मितः पर्वतवासनित्यः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
निरीक्षन्तमवित्रस्तं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः |
७१ क
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
निरीक्षमाणा भर्तारं सर्वावस्थमनिन्दिता |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
निरीक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य; ध्वजं महान्तं यशसा ज्वलन्तम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
निरीक्षमाणाः शनकैर्जहुर्नराः; समुत्थितारुण्डकुलोपसङ्कुलम् ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
निरीक्षमाणास्तु वय़ं परे चाय़ोधनं शनैः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
निरीक्षितुं न शेकुस्ते भीष्ममप्रतिमं रणे |
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद्योद्धुं कुतः पुनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
निरीक्षितुममोघेषुं करिष्यन्ति कुतो रणम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
निरीक्षितो वै नरदेव राज्ञा; पूतात्मना निर्हृतकल्मषेण |
३९ क