chevron_left  दिव्यावृतौarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
दिव्यावृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णा; ववाक्षाखः पिप्पलः सप्त गोपाः |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्याश्चाप्यान्तरिक्षाश्च पार्थिवाश्चानिलोपमाः |
१०९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्याश्चाप्सरसां सङ्घाः सगन्धर्वाः सकिंनराः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
दिव्याश्वय़ुजि संनद्धे काञ्चनेन विभूषिते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
दिव्यास्त्रमन्त्रमुदिताः सादय़ेय़ुः सुरानपि ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
दिव्यास्त्रविदुषः शूराः क्षपय़िष्यन्ति ते रिपून् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
दिव्यास्त्रविदुषः सर्वे भवन्तो हि वले मम ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यास्त्राणि महातेजा यो धारय़ति वुद्धिमान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दिव्ये चास्त्रे माय़या वध्यमाने; नैवामुह्यच्चिन्तय़न्प्राप्तकालम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन गन्धेन समाकुलं च; दिव्यैश्च माल्यैरवकीर्यमाणम् ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन चक्षुषा पश्यन्मनसानुद्धतेन च |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
दिव्येन रूपेण च प्रज्ञय़ा च; तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
दिव्येन विधिना ज्ञात्वा भावितात्मा महानृषिः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन विधिना पार्थ तच्छृणुष्वाविचारय़न् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन विधिना राजन्कश्यपाय़ त्रय़ोदश ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येन विधिना राजा वन्येन कुरुसत्तमः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
दिव्येनास्त्रेण रिपुहन्घोरेणाद्भुतकर्मणा ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोय़चराश्च ये ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यो ये चान्ये परिपन्थिनः ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तत्र तौ |
७ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
दिव्यैः कामफलैर्वृक्षै रत्नैश्च समलङ्कृताम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यैः पक्षिगणैश्चैव शुशुभे श्वेतपर्वतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
दिव्यैः पुष्पैः समाकीर्णमन्तरिक्षं समन्ततः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
दिव्यैरस्त्रैरभ्यविध्यच्च सोऽपि; कर्णस्य पुत्रो नकुलं कृतास्त्रः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
दिव्यैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
दिव्यैर्गन्धैः समादिग्धं क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
दिव्यैर्महास्त्रैर्नकुलं महास्त्रो; दुःशासनस्यापचितिं यिय़ासुः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यैर्वस्त्रैररजोभिः सुवर्णै; र्माल्यैश्चाग्र्यैः शोभमानानतीव |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यैर्हय़वरैर्युक्तमग्निकुण्डात्समुत्थितः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
दिव्यैर्हय़ैरवमृद्नन्रथौघां; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणो; महार्णवं निःसलिलं चकार ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात्पर्यवाकिरन् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
दिव्यो देवपथो ह्येष नात्र गच्छन्ति मानुषाः |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यो ध्वजवरो राजन्दृश्यते देवमानुषैः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
दिव्यौ सुपर्णौ विरजौ विमाना; वधिक्षिय़न्तौ भुवनानि विश्वा ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
दिशं धनपतेरिष्टामजय़त्पाकशासनिः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
दिशं प्रतीचीं वशमानय़न्मे; माद्रीसुतं कच्चिदेनं स्मरन्ति ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
दिशं प्रतीचीमादित्या नासत्या उत्तरां दिशम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
दिशं प्राचीं प्रतीचीं च न जानीमोऽस्त्रमोहिताः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
दिशं प्राचीं समाश्रित्य हृष्टानां गर्जतां भृशम् |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
दिशं वैश्रवणाक्रान्तां यदा गन्ता दिवाकरः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति ||
११ ग
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
दिशं ह्युदीचीमपि चोत्तरान्कुरू; न्गाण्डीवधन्वैकरथो जिगाय़ |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
दिशः खं चैव भूमिं च प्रावृणोच्छरवृष्टिभिः ||
३१ ख