वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
काले विभूतिं भूतानामुपहारांस्तथैव च |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
काले व्यसनमाकाङ्क्षन्नैवाय़मजरामरः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
काले शक्त्या मत्सरं वर्जय़ित्वा; शुद्धात्मानः श्रद्धिनः पुण्यशीलाः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
काले हि शत्रून्प्रतिपीड्य सङ्ख्ये; हत्वा च शूरान्पृथिवीपतींस्तान् |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
काले हि समनुप्राप्ते त्यक्तव्यमपि जीवितम् ||
७६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कालेडिका वामनिका मुकुटा चैव भारत |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन किय़ता शत्रून्क्षपय़ेरिति संय़ुगे ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन कृष्णाश्च सिताश्च रात्र्यः; कालेन चन्द्रः परिपूर्णविम्वः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
व्रह्मदत्त उवाच
कालेन क्रिय़ते कार्यं तथैव विविधाः क्रिय़ाः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
कालेन चापि सा कन्या यौवनस्था वभूव ह ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
कालेन चोदितं विप्र त्वामितो नेतुमद्य वै ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
कालेन जाता जाता हि वाय़ुनेवाभ्रसञ्चय़ाः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
कालेन तत्कृतं विद्धि विहता येन पार्थिवाः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कालेन त्वाहमजय़ं कालेनाहं जितस्त्वय़ा |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
कालेन नातिमहता गरुडः पततां वरः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन निहतं सर्वं जगद्वै भरतर्षभ |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन पद्मोत्पलवज्जलं च; कालेन पुष्यन्ति नगा वनेषु ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन परिपक्वा हि म्रिय़न्ते सर्वमानवाः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
कालेन परिपक्वानां तालानां पततामिव ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन परिपक्वानि तावच्छाम्यतु वैशसम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
कालेन महता कद्रूरण्डानां दशतीर्दश |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
देवा ऊचुः
कालेन महता क्लेशाद्व्रह्माधिगतमुत्तमम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
कालेन महता चैषां भविष्यति पराभवः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन महता जह्रुस्तत्सुवर्णं ततस्ततः ||
२५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
कालेन महता तस्य दिव्या दृष्टिरजाय़त ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन महता पश्चात्कालधर्ममुपेय़िवान् ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
कालेन महता यत्ताः कुले ये च विवर्धिताः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
कालेन महता राजञ्श्रुतिरेषा सनातनी ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
कालेन महता राजन्कालधर्ममुपेय़िवान् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
कालेन महता राजन्समाकीर्णः पिपीलिकैः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
कालेन महता वेदाः शक्या गुरुमुखाद्विभो |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
कालेन महतागच्छत्स तु वाराणसीं पुरीम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
जनक उवाच
कालेन यद्धि प्राप्नोति स्थानं तद्व्रूहि मे द्विज |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कालेन रिपुणा सन्धिः काले मित्रेण विग्रहः |
१९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
कालेन विधृतं सर्वं मा कृथाः शक्र पौरुषम् ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
कालेन विनिय़ुज्यन्ते सत्त्वमेकं तु शोभनम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
कालेन शीघ्राः प्रविवान्ति वाताः; कालेन वृष्टिर्जलदानुपैति |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
कालेन साधय़ेन्नित्यं नाप्राप्तेऽभिनिपीडय़ेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कालेनाक्रम्य लोकेऽस्मिन्पच्यमाने वलीय़सा |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
कालेनान्यस्तस्य मूलं हरेत; कालज्ञाता पार्थिवानां वरिष्ठः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद्वाप्यर्थसम्भ्रमे ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कालेनाभ्याहताः सर्वे कालो हि वलवत्तरः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
कालेनाल्पेन राजंस्ते विविशुः स्वपुरं तदा ||
४७ ग
सभा पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
कालेनाल्पेनाथ निष्ठां गतां तां; सभां रम्यां वहुरत्नां विचित्राम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
कालेनाहं प्रणुदितः पन्नग त्वामचूचुदम् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
कालेनेव प्रजाः सर्वाः के भीमं पर्यवारय़न् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
कालेनेव फलं पक्वं हृदय़ं मे विदीर्यते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
कालेनैते हताः पूर्वं निमित्तमनुजस्तव ||
४२ ख