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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
निवासे धर्मशीलानां विषय़ेषु पुरेषु च ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
निवासेऽप्सरसां दिव्ये कामचारी महीय़ते ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
हिडिम्वो उवाच
निवासो राक्षसस्यैतद्धिडिम्वस्य ममैव च ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
निवास्यन्तां रुरुचर्माणि सर्वे; यथा ग्लहं सौवलस्याभ्युपेताः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
निविशन्त्यां पुरा पार्थ द्वारवत्यामिति श्रुतिः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
निविशस्वेति दुःखार्तास्तेषां प्रिय़चिकीर्षय़ा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
निविशेय़ुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदाचरेत् ||
१०७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
निविश्य च महात्मानस्ततस्ते पुरुषर्षभाः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
च्यवन उवाच
निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भय़म् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
निविष्टः सर्वभावेन धनञ्जय़मवेक्ष्य च ||
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
निविष्टांस्तान्निशम्याथ समुद्रान्ते स योगवित् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
निविष्टान्पाण्डवांश्चापि प्रीय़माणान्महारथान् |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
निविष्टान्पाण्डवांस्तत्र ज्ञात्वा मित्राणि भारत |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
निविष्टे तत्र कौन्तेय़े व्राह्मणेषु च भारत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षेमी भागवतप्रिय़ः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
निवृत्तं पश्य कौन्तेय़ भीमसेनं युधां पतिम् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
निवृत्तं प्रतिकूलेभ्यो वर्तमानमनुप्रिय़े |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
निवृत्तं मां चिरं राजन्विप्रं लोभय़से कथम् |
७९ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
निवृत्तकृषिगोरक्षा विध्वस्तनगराश्रमा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
निवृत्तदेवकार्या च पुण्योद्वाहविवर्जिता ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
निवृत्तपितृकार्यं च निर्वषट्कारमङ्गलम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
निवृत्तपूगसमय़ा सम्प्रनष्टमहोत्सवा ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तमथ तं तस्मादभिप्राय़ाद्विचेतसम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तमात्रे त्वय़न उत्तरे वै दिवाकरे |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तमेनं द्रक्ष्यामः पुनरेवं च तेऽव्रुवन् ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
निवृत्तवनवासान्नः श्रुत्वा वीर समागताः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
निवृत्तवासान्कौन्तेय़ान्य आहुर्विदिता इति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
निवृत्तशीलदोषो यः श्रद्धावान्पूत एव सः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तश्चार्जुनस्तत्र विवाहं कृतवांस्ततः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तसमय़ाः पार्था महात्मानो महावलाः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तसमय़ास्ते हि सत्यव्रतपराय़णाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
निवृत्ता मधुमांसेभ्यः परदारेभ्य एव च |
८७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तांश्च कुरुश्रेष्ठान्दृष्ट्वा प्ररुरुदुस्तदा ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
निवृत्ताः सहसा योधास्तव पुत्रप्रिय़ैषिणः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
निवृत्तानां महाराज मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
निवृत्ताश्चैव मद्येभ्यस्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षय़धर्मिणाम् |
८८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
निवृत्तिं सर्वभूतेषु मृदुना दारुणेन वा ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
निवृत्तिरुपभोगस्य गोरसानां च वै रतिः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
निवृत्तिर्नैतय़ोरस्ति नानिवृत्तिः कथञ्चन ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
निवृत्तिलक्षणं धर्ममव्यक्तं व्रह्म शाश्वतम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
निवृत्तिलक्षणं धर्ममुपासे संहितां जपन् ||
७८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
निवृत्तिलक्षणस्त्वन्यो धर्मो मोक्ष इति स्मृतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथानन्त्याय़ कल्पते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाभ्युदय़िकोऽपि च ||
३४ ख