chevron_left  ततोऽशपञ्शपथान्पर्ययेण;arrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
ततोऽशपञ्शपथान्पर्ययेण; सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽशीतिं शिनेः पौत्रः साय़कान्कृतवर्मणे |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
ततोऽश्मवर्षं सुमहत्प्रादुरासीत्समन्ततः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽश्मवर्षं सुमहद्व्यसृजत्पाकशासनः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
ततोऽश्मवर्षे निहते जलवर्षं महत्तरम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽश्मवृष्टिरत्यर्थमासीत्तत्र समन्ततः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽश्मवृष्टिरत्युग्रा महत्यासीत्समन्ततः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽश्मसहिता धाराः संवृण्वन्त्यः समन्ततः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ततोऽश्वमेधिकं नाम पर्व प्रोक्तं चतुर्दशम् |
२०६ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ततोऽश्वमेधिकं पर्व सर्वपापप्रणाशनम् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् |
८२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽश्वान्रजतप्रख्यांश्चोदय़ामास माधवः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽश्वान्रजतप्रख्यांश्चोदय़ामास माधवः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
ततोऽष्टगुणमप्यस्मै भोज्यं दास्याम्यहं सदा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
ततोऽसि गतसंमोहः कृतकृत्यो द्विजर्षभ ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
ततोऽसि वक्त्राद्विप्रर्षे द्रुतं निःसारितो मय़ा |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽसितः सुसंरव्धो व्यवसाय़ी दृढव्रतः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
ततोऽसुराश्चक्रभिन्ना वमन्तो रुधिरं वहु |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽसृजद्वाणवर्षं घर्मान्ते मघवानिव ||
२० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
ततोऽस्तं भास्करे याते सन्ध्याकाल उपस्थिते |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग्योजय़ामास कौरवः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
ततोऽस्त्रं शव्दसाहं वै त्वरमाणो महाहवे |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्त्रमस्त्रेण निवार्य तेषां; गाण्डीवधन्वा कुरुपुङ्गवानाम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्त्रमस्त्रेण परस्परस्य तौ; विधूय़ वाताविव पूर्वपश्चिमौ |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततोऽस्त्रमहमाग्नेय़मनुमन्त्र्य प्रय़ुक्तवान् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्त्रसङ्घर्षकृतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् |
१५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्त्रैः परमैर्दिव्यैर्द्रोणः पार्थमवाकिरत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
ततोऽस्मान्सुपरिश्रान्तांस्तपसा चापि कर्शितान् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
ततोऽस्माभिः समीक्ष्यैवं नात्मनात्मा विनाशितः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्मि पतितो भूमौ न च मामजहात्स्मृतिः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
ततोऽस्मि वहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान्ग्रहणं तदा |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्मै तद्यथावृत्तं वासुदेवः प्रिय़ंवदः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
ततोऽस्मै प्रासृजद्घोरमैषीकमपराजितः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
ततोऽस्मै प्राहरद्वज्रं घोररूपं शचीपतिः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्मै प्राहिणोद्द्रोणः शरानधिकविंशतिम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य कार्मुकं द्वाभ्यां सूतं द्वाभ्यां च विव्यधे |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य काय़ान्निचकर्त नाकुलिः; शिरः क्षुरेणाम्वुजसंनिभाननम् ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य काय़ो वसुधां पश्चात्प्राप तदा च्युतः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य कुपितान्यासन्नक्षत्राणि महात्मनः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
ततोऽस्य केशान्सव्येन गृहीत्वा पाणिना तदा |
१२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य गदय़ा दान्तान्हय़ान्सर्वानपातय़त् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य वलादिव |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
ततोऽस्य जाय़ते तीव्रा वेदना तत्क्षय़ात्पुनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
ततोऽस्य तुष्टो भगवान्भक्त्या नाराय़णो हरिः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽस्य दक्षिणं वाहुं खड्गेनाजघ्निवान्वली |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य दत्तवान्द्वारं नय़ुद्धेनारिमर्दन ||
७ ख