कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
समः किरीटिना सङ्ख्ये वीर्येण च वलेन च |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
समः पन्था भृता योधाः श्वो युध्यस्व सकेशवः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
समः पार्थेन समरे वासुदेवेन वा भवेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
समः पुत्रेषु च स्नेहः शिष्येषु च तव ध्रुवम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानावमानय़ोः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
समः शत्रौ च मित्रे च स वै मुक्तो महीपते ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
समः सञ्ज्ञागतस्त्वेवं यदा सर्वत्र दृश्यते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
समः सर्वस्य लोकस्य पितृमातृभय़ापहः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
समः सर्वेषु भूतेषु ईश्वरः सुखदुःखय़ोः |
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु मैत्राय़णगतिश्चरेत् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु लव्धालव्धेन वर्तय़न् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु व्रह्माणमभिवर्तते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु सधर्मा मातरिश्वनः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
समः सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निवध्यते ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
समकम्पत दुर्धर्षः क्षितिकम्पे यथाचलः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
समकम्पत सा सेना विभ्रष्टा नौरिवार्णवे ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
समकम्पन्त पाञ्चाला गावः शीतार्दिता इव ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
समकम्पन्त सर्वाणि सिन्धोरिव महोर्मय़ः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
समकम्पन्त सैन्यानि त्वदीय़ानि पुनः पुनः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
समकम्पन्त सैन्यानि परस्परसमागमे ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
समकम्पन्त सैन्यानि पाण्डवानां विशां पते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
समकालं च राज्ञोऽपि देव्याः पुत्रो व्यजाय़त ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
समक्षं तव कौरव्य यदूचुः कुरवस्तदा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
समक्षं तव गोविन्द न तत्क्षन्तुमिहोत्सहे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
वैशम्पाय़न उवाच
समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ||
२७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
समक्षं पार्थिवेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
समक्षदर्शनात्साक्ष्यं श्रवणाच्चेति धारणात् |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
समग्रा पार्थिवी सेना पार्थमेकं धनञ्जय़म् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
समग्रा यत्र वर्तन्ते तच्छरीरमिति स्मृतम् ||
११२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
समग्रैस्त्रिदशैस्तत्र इष्टमासीद्द्विजर्षभ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
समङ्गलस्वस्त्ययनमारुरोह रथोत्तमम् ||
४० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
समङ्गाः कोपनाश्चैव कुकुराङ्गदमारिषाः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
समजाय़त गात्रेषु पावकोऽङ्गारधूमवान् ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
समज्वलद्भारत पावकाभो; वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो वृषः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
समता यदि ते राजन्स्वेषु पाण्डुसुतेषु च ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
समता सत्यमानृण्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
समतां वसुधाय़ाश्च स सम्यगुपपादय़त् |
११९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
समतां समनुप्राप्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
समतामुपसङ्गम्य रूपं हन्यान्न वा नृप ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
समतीता नृशंसास्ते धर्मेण निहता युधि ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
समतीतानि राजेन्द्र सर्गाश्च प्रलय़ाश्च ह ||
१०४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
समतीतोऽसि कौन्तेय़ कालशैलं च पार्थिव ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
समतीत्य वहून्देशान्गिरींश्च वहुपादपान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
समत्वाद्धि प्रिय़ो नास्ति नाप्रिय़श्च कथञ्चन |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
समदुःखसुखं ज्ञात्वा विस्मितः पाकशासनः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय़ कल्पते ||
१५ ख