वन पर्व
अध्याय
९७
अगस्त्य उवाच
तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
तावदेवाद्य ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
तावद्गर्जसि राधेय़ यावत्पार्थं न पश्यसि |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तावद्युष्मास्वपापेषु प्रचरिष्यति पातकम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गं प्राप्य महीय़ते ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गे वसति मानवः ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
तावन्तरिक्षगौ शीघ्रमनुय़ान्तं महीचरम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
तावन्तरिक्षमुत्पत्य दैत्यौ कामगमावुभौ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तावन्ये धनुषी श्रेष्ठे शक्रचापनिभे शुभे |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तावन्ये धनुषी सज्ये कृत्वा भोजं विजघ्नतुः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
तावन्ये धनुषी सज्ये कृत्वा शत्रुभय़ङ्करे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं गदाग्राभ्यां संहत्य पतितौ क्षितौ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं जिघांसन्तौ शरैस्तीक्ष्णैर्महारथौ |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं तु दृष्ट्वैव संरम्भं जग्मतुः परम् ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं दृढं विद्धावन्योन्यशरविक्षतौ |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं ध्वजौ विद्ध्वा सारथी च महारथौ |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं निरीक्षेतां क्रुद्धाविव महाद्विपौ |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं भृशं विद्ध्वा रुधिरेण समुक्षितौ |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं महाराज ततक्षाते शरैर्भृशम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं महाराज समासाद्य महाहवे |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरै राजन्प्रच्छाद्य समरे स्थितौ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरैः कृत्तौ व्यराजेतां नरर्षभौ |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरैः सङ्ख्ये सञ्छाद्य सुमहारथौ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरैर्घोरैश्छादय़ानौ महारथौ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं शरैर्विद्ध्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
तावन्योन्यं समाश्लिष्य पृष्ट्वा च कुशलं वने |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
तावन्योन्यं समाश्लिष्य विकर्षन्तौ परस्परम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं समासाद्य वृषभौ सर्वधन्विनाम् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं समासाद्य समरे युद्धदुर्मदौ |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं सुसंरव्धौ शरवर्षाण्यमुञ्चताम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं सुसङ्क्रुद्धौ चक्रतुः सुभृशं रणम् ||
३१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यं हय़ान्हत्वा धनुषी विनिकृत्य वै ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहावलौ |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यस्य धनुषी छित्त्वान्योन्यं विनेदतुः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
तावन्योन्यस्य समरे निहत्य रथवाजिनः |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तावपश्यत्स भगवाननादिनिधनोऽच्युतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
तावपि ख्याततपसौ नरनाराय़णावृषी |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
तावपि स्पर्धिनौ राजन्पृथगास्तां परस्परम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चय़ः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तावप्यग्निशिखाप्रख्यैर्जघ्नतुस्तस्य मार्गणान् ||
१०९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तावप्याचख्यतुस्तस्मै प्रिय़ं प्रिय़करौ तदा |
१४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
तावप्येतेन मार्गेण गच्छेतां परमां गतिम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
व्रह्मो उवाच
तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तावप्येनं विव्यधतुर्दशभिर्दशभिः शरैः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
तावभिद्रवतामेनमुभावुद्यतकार्मुकौ |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तावभ्यधावतां तीक्ष्णौ द्वावप्येनं महारथम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमोरजगुणान्वितौ |
२४ क