वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न स धर्मस्य वेदार्थं सूर्यस्यान्धः प्रभामिव ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
न स धर्मेण धर्मात्मन्युज्यते यशसा न च ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
न स नार्हति दुष्टात्मा वधं ससुतवान्धवः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न स पाण्डुसुतो जेतुं शक्यः केनचिदाहवे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रिय़ः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रिय़ः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
न स पार्थस्य सङ्ग्रामे कलामर्हति षोडशीम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
न स पुत्राञ्जनय़ितुं दारान्मूढश्चिकीर्षति |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
न स प्रमाणतामर्हो विवादजननो हि सः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
न स भीष्मो महावाहुर्मामिच्छति विशां पते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मतिः ||
१२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३४
सूत उवाच
न स यज्ञो न भविता न स राजा तथाविधः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न स युक्तोऽन्यथा जेतुमृते युद्धेन माधव |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
न स राजापराध्नोति पुत्रस्तव महामनाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
न स रात्रौ सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न स लभ्यः पुनर्जातु मय़ि जीवति केशव ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
न स लोभय़ितुं शक्यः फलैर्वहुविधैरपि ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न स वीरो न मातङ्गो न सदश्वोऽस्ति भारत |
८४ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
न स वृष्णिकुले जातो यो वै त्यजति सङ्गरम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
न स वेद परं धर्मं यो न वेद चतुष्टय़म् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
न स शक्तोऽभविष्यद्वै पातने तस्य तेजसा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे |
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
न स शक्यः सुदुर्धर्षो धैर्याच्चालय़ितुं प्रभो |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
न स शक्यस्त्वय़ा द्रष्टुं मय़ान्यैर्वापि सत्तम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
न स शक्यस्त्वय़ा द्रष्टुमस्माभिर्वा वृहस्पते |
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
न स शक्येत सङ्ग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
न स शक्यो अभक्तेन द्रष्टुं देवः कथञ्चन ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
न स शक्यो युधा जेतुमन्यं कुरु मनोरथम् ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
न स शक्यो रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरैः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
न स शोच्यस्त्वय़ा तात न चान्यैः कुरुभिस्तथा ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न स संनह्यते राजन्निति मामव्रवीद्वचः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
न स संशय़माप्नोति रोचतां वां व्रजामहे ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
न स सज्जति वृक्षेषु शस्त्रैश्चापि न रिष्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
न स सिंहफलं भोक्तुं शक्तः श्वभिरुपासितः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
न संनतिं प्रैमि सुय़ोधनस्य; न त्वा जानाम्याधिरथेर्भय़ार्तम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न संनिकाशय़ेद्धर्मं विविक्ते विरजाश्चरेत् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न संनिकृष्टो मेधावी नाशुचिर्न च सत्सु च |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छय़ा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न संनिपातः कर्तव्यः सामान्ये विजय़े सति |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न संरम्भेणारभतेऽर्थवर्ग; माकारितः शंसति तथ्यमेव |
९० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेय़ुरकुतोभय़ाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेय़ुरकुतोभय़ाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
न संविशामि नाश्नामि सदा कर्मकरेष्वपि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
न संशय़मनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न संसज्जेत्तरुभिः संवृतोऽपि; तथा हि माय़ा विहिता भौवनेन ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न संसरति जातीषु परमं स्थानमाश्रितः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
अर्जुन उवाच
न सकामाः परे कार्या धर्ममेवाचरोत्तमम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
द्रुपद उवाच
न सख्यमजरं लोके जातु दृश्येत कर्हिचित् |
५ क