chevron_left  धारय़िष्याम्यहंarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
धारय़िष्याम्यहं प्राणानुत्तराय़णकाङ्क्षय़ा |
९८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धारय़िष्याम्यहं प्राणान्यतिष्ये च नशोचितुम् ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
धारय़िष्ये ततः प्राणानुत्सर्गे निय़ते सति |
१०० क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
धारय़िष्ये महावाहो गगनात्प्रच्युतां शिवाम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
धारय़ीत सदा दण्डं वैल्वं पालाशमेव वा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
धारय़ेद्यः शमपरः स गच्छेत्परमां गतिम् ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
धावतश्चाप्यपश्यच्च तत्र त्रीन्पुरुषर्षभान् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
धावतस्तस्य वीरस्य मृगार्थे वातरंहसः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
धावतां च दिशो राजन्वित्रस्तानां समन्ततः |
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
धावतां च रथौघानां निघ्नतां च पृथक्पृथक् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
धावन्तं मुक्तकेशं वा हन्ति पार्थो धनञ्जय़ः ||
११८ ग
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
धावन्तश्चाप्यदृश्यन्त श्वसमानाः शरातुराः ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
धावन्तो जवनाश्चण्डाः पवनोद्धूतमूर्धजाः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
चण्डाल उवाच
धावमानं सुसंरव्धं पश्य मां रजसान्वितम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
धावमानस्य योधस्य क्षुरप्रैः स महामृधे |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
धावमानानपश्याम कुञ्जरान्पर्वतोपमान् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
धावमानान्परांश्चैव दृष्ट्वान्ये तत्र भारत |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
धावमानान्रणे व्यग्रान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
धावमानाश्च दृश्यन्ते काकगृध्रवलास्तथा ||
३५ ग
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
धावमानेषु योधेषु जय़गृद्धिषु मारिष ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
धिक्कर्तारं च कार्यं च श्रमश्चाय़ं निरर्थकः ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
धिक्कार्यं मा धिक्कुरुते तस्मात्त्वाहं प्रसादय़े |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्कुर्वन्तस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
धिक्कृतः पार्षतस्तं तु सर्वभूतैः परामृशत् ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
धिक्कृताः पार्थिवैः सर्वैः स्वजनेन च सर्वशः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
धिक्केकय़ांस्तथा चेदीन्मत्स्यांश्चैवाथ सृञ्जय़ान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
धिक्क्रोधं धिक्सखे लोभं धिङ्मोहं धिगमर्षितम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
धिक्क्षत्रधर्ममित्युक्त्वा यय़ौ पार्थरथं प्रति ||
३७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्खल्वलघुशीलानामुच्छ्रितानां यशस्विनाम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्तं दुर्योधनं क्षुद्रं राज्यलुव्धं च मानिनम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
धिक्तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रे यस्यावसीदति |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय १४०
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्त्वामसति पुंस्कामे मम विप्रिय़कारिणि |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्त्वामस्तु सुदुर्वुद्धिं क्षत्रधर्माविशारदम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
धिक्षव्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षणः |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
धिक्षव्देन महातेजा गर्हय़ामास वीर्यवान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
धिक्षव्दो हि वुधैर्दृष्टो मद्विधेषु मनस्विषु |
१८१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
कृप उवाच
धिक्सद्यो निहतः शेते पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
धिगग्निं धिक्च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसन्धताम् ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
धिगर्थान्यत्कृते ह्येवं क्रिय़ते ज्ञातिसङ्क्षय़ः ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम् |
३४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
धिगस्तु कृष्णं वार्ष्णेय़मर्जुनं चापि दुर्मतिम् |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
धिगस्तु क्रूरकर्तॄंस्तान्कृपकर्णजय़द्रथान् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्तु क्षत्तारमिति व्रुवाणो; दर्पेण मत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु वलपौरुषम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु वलमौरसम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु वलमौरसम् |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्तु खलु मानुष्यं मानुष्ये च परिग्रहम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
धिगस्तु खलु मानुष्यं यस्य निष्ठेय़मीदृशी |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
धिगस्तु नष्टः खलु भारतानां; धर्मस्तथा क्षत्रविदां च वृत्तम् |
३३ क