आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
पितर ऊचुः
न हि युक्तं त्वय़ा हन्तुं व्राह्मणेन सता नृपान् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
न हि युद्धं प्रशंसन्ति सर्वावस्थमरिन्दम ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
न हि युद्धकथां काञ्चित्तत्र चक्रुर्महारथाः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षय़ात् ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि युद्धेन पुत्रस्ते धर्मेण स महावलः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येय़मापदः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
न हि रक्षन्ति राजानः सर्वार्थान्नापि जीवितम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
न हि रक्षन्ति राजानो युध्यन्तो जीवितं रणे |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
न हि रम्यतरं किञ्चित्तस्मादन्यत्पुरोत्तमम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन्सुखमवाप्नुय़ात् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
न हि राज्ञा प्रमादो वै कर्तव्यो मित्ररक्षणे |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
द्रुपद उवाच
न हि राज्ञामुदीर्णानामेवं भूतैर्नरैः क्वचित् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि राज्यं महाप्राज्ञ स्वेन कामेन शक्यते |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न हि राज्यमशिष्टेन शक्यं धर्मार्थलोपिना ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
न हि रामो रणे जेतुं त्वय़ा न्याय़्यः कुरूद्वह |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
न हि वज्रनिपातेन रुजा मेऽस्ति कदाचन ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
जाजलिरु उवाच
न हि वर्तेदय़ं लोको वार्तामुत्सृज्य केवलम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
राम उवाच
न हि वाणा मय़ोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
न हि वाय़ोर्वलेनास्ति भूतं तुल्यवलं क्वचित् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
न हि विज्ञाय़ते शक्रः प्राप्तः किं वा क्व वा गतः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
न हि विद्मो गतिं तेषां वासं वापि महात्मनाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
न हि विष्णुः प्रणमति कस्मैचिद्विवुधाय़ तु |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
न हि वुद्ध्या समं किञ्चिद्विद्यते पुरुषे नृप |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न हि वुद्ध्यान्विताः प्राज्ञा नीतिशास्त्रविशारदाः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्यवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि वेदोक्तमुत्सृज्य विप्रः सर्वेषु कर्मसु |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
न हि वेश्मनि शूद्रस्य कश्चिदस्ति परिग्रहः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
न हि वै तानि लिङ्गानि नलं शंसन्ति कर्हिचित् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
न हि वैक्लव्यसंसृष्ट आनृशंस्ये व्यवस्थितः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
न हि वैक्लव्यसंसृष्टमानृशंस्यमिहास्थितः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
न हि वैरं महात्मानो विवृण्वन्त्यपकारिषु |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न हि वैरं समासाद्य प्रशाम्यति वृकोदरः |
८३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
न हि वैरं समासाद्य सीदन्ति पुरुषर्षभाः ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न हि वैराग्निरुद्भूतः कर्म वाप्यपराधजम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न हि वैराणि शाम्यन्ति कुलेष्वा दशमाद्युगात् |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
न हि वैराणि शाम्यन्ति दीर्घकालकृतान्यपि |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
न हि वैरान्तमनसः स्थास्यन्ति मम सैनिकाः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
न हि वोढुं रथः शक्तः शरान्मम यथेप्सितान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ; समेत्य देवैरपि धर्मराज ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ते सन्नराः क्वचित् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
न हि शक्तो युधा जेतुं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधमः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
धृष्टद्युम्न उवाच
न हि शक्तो रणे द्रोणो विजेतुं मां कथञ्चन ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
न हि शक्नोति संय़न्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
न हि शक्नोमि त्वां द्रष्टुं दिवाकरमिवोदितम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न हि शक्नोषि मार्जार पाशं छेत्तुं विना मय़ा |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
न हि शक्यं प्रधानेन श्रेय़ः सङ्ख्यातुमात्मनः ||
५७ ख