विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य जिष्णुरुपावृत्य पृथुधारेण कार्मुकम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
तस्य जिष्णोर्वृसीं दृष्ट्वा शून्यामुपनिवेशने |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
तस्य जिह्ममभिप्राय़ं ज्ञात्वा द्रोणोऽर्थतत्त्ववित् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्ञातिर्हि विक्रान्तो व्राह्मणादो वको हतः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
तस्य ज्याच्छेदनं कर्णो ज्यावधानं च संय़ुगे |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्यातलघोषेण क्षत्रिय़ान्भय़माविशत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तस्य ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे दिक्षु मारिष |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तस्य तं तुमुलं शव्दं श्रुत्वा कुञ्जरकम्पनम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्य तं नदतो नादं सुघोरं भीमनिस्वनम् |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा दृष्ट्वा नागांश्च युध्यतः |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन्वहुधा जनाः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा प्रहृष्टोऽभूद्युधिष्ठिरः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिस्वनम् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा सम्प्रावेपन्त धन्विनः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजय़ः पारिक्षितः पौरोहित्याय़ वव्रे ||
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तस्य तं मानुषं भावं भावज्ञोऽऽज्ञाय़ पाण्डवः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तस्य तच्चरितं दृष्ट्वा सङ्ग्रामे भीमकर्मणः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्य तच्चरितं दृष्ट्वा सङ्ग्रामे विजय़ैषिणः |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमद्दंशितात्मनः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
तस्य तच्छतधा रूपमभवच्च सहस्रधा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
तस्य तच्छिद्रमाज्ञाय़ धृष्टद्युम्नः समुत्थितः |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
६४
उत्तर उवाच
तस्य तत्कर्म वीरस्य न मय़ा तात तत्कृतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तत्काञ्चनं छत्रं ध्रिय़माणं व्यरोचत |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तस्य तत्कापिलेय़त्वं सर्ववित्त्वमनुत्तमम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
तस्य तत्किल्विषं लुव्ध विद्यते यदि किल्विषम् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तत्कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्कुर्वतः कर्म नकुलस्य सुतो रणे |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्कुर्वतः कर्म महत्सङ्ख्येऽद्भुतं नृपाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तत्कौशलं दृष्ट्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्तद्व्रुवाणस्य रोषः समभवन्महान् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्पूजय़ामास लाघवं शन्तनोः सुतः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्पूजय़ामास लाघवं शन्तनोः सुतः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
तस्य तत्पूर्वसंरुद्धं मनःषष्ठमनन्तरम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तत्प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तत्सत्यमेवास्तु मनुष्येन्द्रस्य भाषितम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तत्सर्वमाचख्यौ भगिनी रामविक्रमम् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तत्सर्वमाचख्यौ सीताय़ा लक्ष्मणो वचः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्सुमहत्कर्म शशंसुः पुरुषर्षभाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्य तत्सुमहद्रूपं दृष्ट्वा सर्वे महारथाः |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्दहतः सैन्यं दृष्ट्वा चैव पराक्रमम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्दिव्यमस्त्रं हि प्रगाढं चित्रमस्यतः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः |
९३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्वचनं धर्म्यमनुवन्धगुणोत्तरम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपाय़नः प्रभुः |
११ क