आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
चचार मृगय़ां कामी गिरिकामेव संस्मरन् |
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
चचार मृगय़ां पार्थ पर्वतोपवने किल ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
चचार रमणीय़ेषु गन्धमादनसानुषु ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
चचार रम्ये धर्म्ये च गौरपेतभय़ा तदा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
चचार लोकान्विप्रर्षिः प्रेक्षमाणो मनोजवः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
चचार विपुलं धर्मं व्रह्मचर्येण संवृता ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
चचार विविधान्मार्गान्महावलपराक्रमः |
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
चचार स महाराज यथादेशं स सत्तम ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
चचार स विनिघ्नन्वै वन्यांस्तत्र मृगद्विजान् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
चचार सङ्ख्ये प्रदिशो दिशश्च; दहन्निवाग्निर्वनमातपान्ते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा; न चापि दारान्मनसाप्यकाङ्क्षत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
चचाराश्रान्तहृदय़ो वातश्चागात्ततो महान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिय़ा वृतः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
चचारोन्मत्तवद्द्रोणो वृद्धोऽपि तरुणो यथा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
चचाल च मही कृत्स्ना भय़े घोरे समुत्थिते ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
चचाल च मही कृत्स्ना सागरश्चापि चुक्षुभे |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
चचाल चापि पृथिवी सशैलवनकानना ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
चचाल नैव कर्णस्य मतिः सत्यधृतेस्तदा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
चचाल पृथिवी चापि चुक्षुभे च महोदधिः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
चचाल पृथिवी राजन्ररास च सुविस्वरम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
चचाल रथमध्यस्थः क्षितिकम्पे यथाचलः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
चचाल रथमध्यस्थो वातोद्धूत इव द्रुमः ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगत्प्रभो ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
चचाल शव्दं कुर्वाणा मही चापि सपर्वता ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
चचाल शव्दं कुर्वाणा सपर्वतवना मही ||
२० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
चचाल समरे द्रौणिर्वातनुन्न इव द्रुमः |
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
चचालाथ सनिर्ह्रादा दिशश्चैवाविलाभवन् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
चञ्चद्वहुपताकेन वलाकावर्णवाजिना |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि वलवद्दृढम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
चण्डग्राहवतीं दृष्ट्वा तस्याः स्रोतस्यवापतत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
चण्डवातं महद्वर्षं प्रादुरासीद्विशां पते ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
चण्डवाताभिपन्नानां समुद्राणामिव स्वनः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
चण्डवाताभिसृष्टानामुदधीनामिव स्वनः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
चण्डवातो यथा मेघः सविद्युत्स्तनय़ित्नुमान् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
चण्डवातोद्धतान्मेघान्निघ्नन्रश्मिमुचो यथा ||
३३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
चण्डवातोद्धुतान्मेघान्सजलानचलो यथा ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
राजन्य उवाच
चण्डाल प्रतिजानीहि येन मोक्षमवाप्स्यसि |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
चण्डालत्वात्कथमहं मुच्येय़मिति सत्तम ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
चण्डालत्वेऽपि मानुष्यं सर्वथा तात दुर्लभम् ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
चण्डालरूपी भगवान्सुमहांस्ते व्यतिक्रमः ||
३१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
चण्डालश्वपचौ वर्ज्यौ निवापे समुपस्थिते |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
चण्डालस्तद्वचः श्रुत्वा महर्षेर्भावितात्मनः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
चण्डालस्य गृहे राजन्सद्यः शस्त्रहतस्य च ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
चण्डालस्य च संवादं क्षत्रवन्धोश्च भारत ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
चण्डालस्वस्य हरणमभक्ष्यस्य विशेषतः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चण्डालात्पाण्डुसौपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
चण्डालात्पुल्कसं चापि खराश्वगजभोजिनम् |
२४ क