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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णं चैव गाश्चैव शय़नाच्छादनं तथा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
सुवर्णं दक्षिणां दत्त्वा तावद्द्विगुणमुच्यते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
सुवर्णं दक्षिणामाहुर्गोप्रदाने महाद्युते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
सुवर्णं परमं ह्युक्तं दक्षिणार्थमसंशय़म् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
सुवर्णं पावनं शक्र पावनानां परं स्मृतम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
सुवर्णं मनुजेन्द्रेण हरिश्चन्द्रेण कीर्तितम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
सुवर्णं ये प्रय़च्छन्ति एवं मे पितरोऽव्रुवन् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
आस्तीक उवाच
सुवर्णं रजतं गाश्च न त्वां राजन्वृणोम्यहम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
सुवर्णं रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णं रजतं गाश्च शय़्याश्च सुमहाधनाः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णं रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णकार्ष्णाय़सवर्मनद्धा; नागा यथा हैमवताः प्रवृद्धाः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णकुसुमाकीर्णान्गिरीणां शिखरेषु च ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
सुवर्णकोशसम्प्राप्तिर्जन्म चोक्तं परिक्षितः |
२०७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
सुवर्णचन्द्रोडुपधारिणीनां; कन्योत्तमानामददं स्रग्विणीनाम् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णचित्रैः कवचैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णचित्रैर्वैय़ाघ्रैः स्वनवद्भिर्महारथैः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
सुवर्णचूडो नागाशी दारुणश्चण्डतुण्डकः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णजालसंवीतान्मणिकुट्टिमशोभितान् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णजालसंवीतैर्मणिकुट्टिमभूषितैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णजालावतता महागजाः; सवैजय़न्तीध्वजय़ोधकल्पिताः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णजालावतता वभुर्गजा; स्तथा यथा वै जलदाः सविद्युतः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णजालावतताः सदश्वा; यतो यतः कामय़ते नृसिंहः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णजालावततौ महास्वनौ; हिमावदातौ परिगृह्य पाणिभिः |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णतारागणभूषितानि; शरावराणि प्रहितानि वीरैः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद्रथात् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
सुवर्णदानेऽकरवं मतिं भरतसत्तम ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
सुवर्णधारिणा नित्यमवशप्ता द्विजातिना ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्तवान्घृतपाय़सम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खं विशिखं समाधाय़ स सात्यकिः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभि; र्विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खा नाराचाः शत्रुघ्ना वैद्युतप्रभाः |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खाञ्शत्रुघ्नान्खचरान्खचरान्प्रति ||
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खाञ्शत्रुघ्नान्खचरान्राक्षसान्प्रति ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खान्विशिखान्द्रोणपुत्रस्य वक्षसि ||
१०८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिः शितैः संनतपर्वभिः |
६७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिः समाचिता; श्चकाशिरे प्रज्वलिता यथाचलाः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिराचितौ तौ व्यरोचताम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्गार्ध्रपक्षैः सुतेजनैः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नानालिङ्गैस्त्रिभिस्त्रिभिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नाराचैश्च सहस्रशः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैर्दशभिर्विव्याधाय़स्मय़ैः शितैः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैः परकाय़विदारणैः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सुवर्णपुङ्खैर्भीमेन साय़कैर्नतपर्वभिः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रय़ः |
६४ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं द्रक्ष्यन्ति कुरवो मम |
४ क