वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तेषां प्रविशतां तत्र मार्गमावृत्य भारत |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
तेषां प्रसन्नो भगवान्सपत्नीको वृषध्वजः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
तेषां प्रसादे निर्वृत्ते कृतकृत्यो भवेन्नृपः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रहृष्टमनसां नादः समभवन्महान् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रादुष्कृताग्नीनां मुहूर्ते रम्यदारुणे |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तेषां प्राद्रवमाणानामुपदेशार्थमात्मनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
तेषां प्रीत्या यशो मुख्यमप्रीत्या तु विपर्ययः |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तेषां प्रोवाच भगवाञ्श्रेय़ः समनुपृच्छताम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
तेषां प्रय़ततां युद्धे शरवर्षाणि मुञ्चताम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रय़तमानानां नादृश्यत महामृगः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां प्रय़ास्यतां तत्र मङ्गलानि शुभान्यथ |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां भागं यच्च मन्येत वालः; शक्यं हर्तुं जीवतां पाण्डवानाम् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां भय़ाभिपन्नानां तदस्माभिः प्रतिश्रुतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
तेषां भय़ोत्पादनजातखेदः; कुर्यान्न कर्माणि हि श्रद्दधानः ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
तेषां मधूनां वहुधा धारा प्रस्रवते सदा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवाञ्शिवः |
१४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तेषां मध्यावतरणं तव कृष्ण न रोचय़े ||
८३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये प्रविशेथा यदि त्वं; न तन्मतं मम दाशार्ह वीर ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये महर्षीणां शृण्वतामनुशोचताम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये महावाहुः केशवो वाक्यमव्रवीत् ||
१२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तेषां मध्ये महावाहुः श्रीमान्केशवपूर्वजः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तेषां मध्ये महावाहुः श्रीमान्केशवपूर्वजः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमसेनो महावलः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये यय़ौ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां मध्ये वर्तमानस्तरस्वी; धृष्टद्युम्नः पाण्डवानामिहैकः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां मध्ये सूर्यमिवातपन्तं; श्रिय़ा वृतं चेदिपतिं ज्वलन्तम् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मध्ये स्थिता यत्र हन्यन्ते मम पुत्रकाः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तेषां मध्ये स्थितो राजा पुत्रो दुर्योधनस्तव |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मनश्च तेजश्चाप्याददानौ दिवौकसाम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तेषां मन्युप्रणाशार्थमृषीणां भावितात्मनाम् ||
१२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां मम विलापानां न हि दुर्योधनः स्मरेत् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिरः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तेषां महास्त्राणि महारथाना; मसक्तकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां महेन्द्रोपमविक्रमाणां; संरव्धानां धर्षणाद्याज्ञसेन्याः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
तेषां मां मानिनीं भार्यां सूतपुत्रः पदावधीत् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां माता वहुविधं विनाशं पर्यचिन्तय़त् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
तेषां मामन्तकं विद्धि दारूणामिव पावकम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
तेषां माहात्म्यभावस्य सदृशं नास्ति किञ्चन ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
तेषां मौण्ड्यं कषाय़श्च वासरात्रिश्च कारणम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
तेषां यः क्षत्रिय़ो वेद वस्त्राणामिव शोधनम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
तेषां यज्ञाश्च वेदाश्च कर्माणि च यथागमम् |
१४ क