वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे; गोभिश्च मार्गेष्वभिकर्षणं च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
क्रोधमानमहास्कन्धो विवित्सापरिमोचनः ||
१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधमाहारय़च्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
क्रोधमाहारय़त्तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
क्रोधमाहारय़त्तीव्रं पदाहत इवोरगः ||
१२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधमाहारय़द्भीमो राक्षसं चेदमव्रवीत् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
क्रोधमुत्सृज्य दत्त्वा च नानुतप्येन्न कीर्तय़ेत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
क्रोधमोहकृते चैव दृष्टान्तागमहेतुभिः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवर्त्य महाभुजः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्तेक्षणः क्रुद्धो जिघांसुः सर्वधन्विनाम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हम्भारवघनस्वना |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्तेक्षणाः क्रूरा हन्तुकामा वृकोदरम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्तेक्षणो राजन्भीमसेनमुपाद्रवत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्तेक्षणौ क्रुद्धौ निःश्वसन्तौ महारथौ |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात्प्रस्फुरिताधरौ |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
क्रोधलोभौ तु तत्रापि कृत्वा व्यसनमर्छति ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
क्रोधलोभौ भय़ं दर्प एतेषां साधनाच्छुचिः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधवर्धन इत्येव यस्त्वन्यः परिकीर्तितः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधशत्रुस्तथैवान्यः कालेय़ा इति विश्रुताः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
क्रोधश्चातिविवित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
क्रोधसंरक्तनय़न इदं वचनमव्रवीत् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
क्रोधसंरक्तनय़ना दर्पपूर्णा पुनः पुनः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नाः समवेक्ष्य परस्परम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नो निःश्वसन्निव पन्नगः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नो वेगेनोत्क्षिप्य कार्मुकम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नौ क्रोधाद्विस्फार्य कार्मुके ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
क्रोधसंरक्तनय़नौ निर्दहन्तौ परस्परम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
क्रोधस्तेजश्च तपसा सम्भृतोऽऽश्रमवासिना |
६ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
क्रोधस्त्वपण्डितैः शश्वत्तेज इत्यभिधीय़ते |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
क्रोधस्य च कुरूणां च शराणां गाण्डिवस्य च ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रोधस्य तु रसो जज्ञे मन्यती चाथ पुत्रिका |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधहन्तेति यस्तस्य वभूवावरजोऽसुरः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधहर्षावनादृत्य पैशुन्यं च विशां पते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
क्रोधहर्षौ विषादश्च जाय़न्ते हि परस्परम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्ववाहुर्महीधरः ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधा प्रावा अरिष्टा च विनता कपिला तथा ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
क्रोधाग्निना दह्यमाना न शेमहि सदा निशाः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधाग्निमुत्सृजद्घोरं धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
क्रोधात्प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
क्रोधात्सन्दष्टदशनौ सन्दष्टदशनच्छदौ ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
क्रोधादभ्यद्रवत्पक्षी रावणं राक्षसेश्वरम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
क्रोधादसूय़यित्वा तं रक्षा मे भवतः कृता ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शल्मले ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
क्रोधाद्दण्डान्मनुष्येषु विविधान्पुरुषो नय़न् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
क्रोधाद्दिधक्षन्निव तिग्मतेजाः; शरानमुञ्चत्तपनीय़चित्रान् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
क्रोधाद्धय़ांस्तस्य रथं ध्वजं च; वाणैः सुधारैर्निशितैर्न्यकृन्तत् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः |
६३ क