उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोष्यामि निनदं स्त्रीणां कथं मां मरणं स्पृशेत् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
श्रोष्यावोऽत्र व्राह्मणानां विवाद; मन्नं चाग्र्यं तत्र भोक्ष्यावहे च |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
श्रय़णाच्छरीरं भवति मूर्तिमत्षोडशात्मकम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
श्रय़ेच्छाय़ामविज्ञातां गुप्तं शरणमाश्रय़ेत् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
श्लक्ष्णपूर्वाभिभाषी च कामक्रोधौ विवर्जय़ेत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
श्लक्ष्णा मधुरसम्भाषा ज्ञातिमध्ये प्रिय़ंवदाः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
श्लक्ष्णां वाणीं निरावाधां मधुरां पापवर्जिताम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
श्लक्ष्णाक्षरतनुः श्रीमान्भवेच्छास्त्रविशारदः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
श्लक्ष्णाय़ां सुपिधानाय़ामश्वनद्यामवासृजत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानय़स्व; चित्रां मालां चात्र वद्ध्वा सजालाम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
श्लक्ष्णो मधुरवाक्स्त्रीणां न चासां वशगो भवेत् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
श्लाघते ज्ञातिमध्ये स्म त्वय़ि प्रव्रजिते वनम् ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
श्लाघते त्वां हि वार्ष्णेय़ो राजन्संसत्सु भारत |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
श्लाघते श्लाघनीय़ाय़ प्रशान्ताय़ तपस्विने |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
श्लाघत्येष सदा वीरः पार्थस्य गुणविस्तरैः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
श्लाघनीय़ं यशस्यं च का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
श्लाघनीय़ा च वर्या च लोके प्रभवतां क्षमा ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
श्लाघन्नश्लाघनीय़ेन कर्मणा निरपत्रपः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
श्लाघन्नेव हि कर्माणि शतशस्तव पाण्डवः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
सोम उवाच
श्लाघमान इवाधीय़ेद्ग्राम्य इत्येव तं विदुः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
श्लाघमानः प्रहृष्टः सन्भाषते भ्रातृभिः सह ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
श्लाघमानाः कुरुश्रेष्ठ करिष्यन्ति जनक्षय़म् ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
श्लाघमानेषु भूतेषु फल्गुनस्यामितान्गुणान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
श्लाघ्यः पार्थिवसङ्घस्य प्रमुखे वाहिनीपतिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
श्लिष्टं तु सर्वतश्चक्रू रथमण्डलमाशु ते |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
श्लेषो यदि च वातेन यदि तस्मात्प्रणश्यति |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
श्लेष्मणः स्फटिकं तस्य पित्तान्मरकतं तथा ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
श्लेष्मणा चापि राजानं ष्ठीवनैश्च समाकिरत् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जय़ेत् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि युष्मासु प्रतिमोक्ष्यति ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
श्लेष्मातकमय़ं चैकं याजकाः समकारय़न् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
श्लेष्मातकस्तथा विप्रैरभक्ष्यं विषमेव च ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
श्लेष्मातकी क्षीणवर्चाः शृणोषि; उताहो त्वां स्तुतय़ो मादय़न्ति |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
श्लोकश्चाय़ं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
श्लोकस्तत्त्वार्थसहितस्तन्मे निगदतः शृणु ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोका नव तथैवात्र सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना |
१६८ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाः सप्तशतं चात्र पञ्चसप्ततिरुच्यते |
१९५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाग्रमत्र कथितं शतान्यष्टौ तथैव च ||
१८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां तु सहस्राणि कीर्तितानि चतुर्दश |
२०० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां तु सहस्राणि षट्सप्तैव शतानि च ||
२०५ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां द्वे शते चैव प्रसङ्ख्याते तपोधनाः ||
२३२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां द्वे सहस्रे तु पञ्च श्लोकशतानि च |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां द्वे सहस्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु |
१३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकानां षट्सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ||
१५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाश्च चतुराशीतिः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः |
१५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
श्लोकाश्च चतुराशीतिर्दृष्टो ग्रन्थो महात्मना ||
९६ ख