शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
सर्वा वुद्धीः परीक्षेथास्तापसाश्रमिणामपि ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४४
भीष्म उवाच
सर्वा वै विधवा नारी वहुपुत्रापि खेचर |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा हि पृथिवी स्पृष्टा त्वत्पाण्डवकृते वधम् ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
सर्वा हृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
सर्वाँल्लोकानतीत्यैतौ गच्छेतां यत्र वाञ्छितम् ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाँल्लोकान्धर्ममूर्त्या चरंश्चा; प्यूर्ध्वं देहान्मोदते देवलोके ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाँल्लोकान्प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
११४
युधिष्ठिर उवाच
सर्वाँल्लोकान्प्रपश्यामि प्रसादात्तव सुव्रत |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
सर्वाँल्लोकान्यदादित्य एकस्थस्तापय़िष्यति |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाँल्लोकान्व्याप्य कीर्त्या मनस्वी; वाजिग्रीवो मोदते देवलोके ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
सर्वां दिशं सम्पतन्तं समीक्ष्य; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
सर्वां रात्रिमध्ययनं करोषि; नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वां श्रिय़ं ह्यात्मवीर्येण लव्ध्वा; पर्याकार्षुः पाण्डवा मह्यमेव ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
सर्वां समग्रां सेनां मे वासवोऽपि न शक्नुय़ात् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वां सेनामुपादाय़ न मे सन्तीह सैनिकाः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
सर्वां हि पृथिवीं दृष्ट्वा युधिष्ठिरवशानुगाम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांश्च कौरवामात्यान्भृत्यांश्च समपूजय़त् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांश्च ताननुय़यौ यावदावसथादिति |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
सर्वांश्च दैत्यांस्त्वरिताः समेत्य; जघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
सर्वांश्च समरे राजन्किरीटी क्षत्रिय़र्षभान् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
सर्वांस्तवार्थाय़ सदेवदैत्याँ; ल्लोकान्दहेय़ं किमु शत्रूंस्तवेह ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीवतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सर्वांस्ताननुवर्तेत स्वरांस्तन्त्रीरिवाय़ता ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तानन्तरा छित्त्वा मुदा चुक्रोश पाण्डवः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचय़कर्मणि ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सर्वांस्तानर्जुनः पार्थः कल्पय़ामास भागतः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तान्कौरवो राजा विधिवत्प्रत्यवैक्षत ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
सर्वांस्तान्धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारय़ेत् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वांस्तितिक्षे सङ्क्लेशान्मा स्म नो भरता नशन् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सर्वांस्तूणीरान्मार्गणान्वान्ववेक्ष्य; किं शिष्टं स्यात्साय़कानां रथे मे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
सर्वांस्त्वन्यान्हनिष्यामि पार्थिवान्भरतर्षभ |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोपय़त्स्वकम् |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
सर्वाः पुष्करमालिन्यः सर्वाः काञ्चनसप्रभाः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाः प्रकृतय़श्चैव प्रय़युर्वारणावतम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाः प्रकृतय़ो राजञ्शोचन्त्यः पर्यवारय़न् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद्यथावद्भरतर्षभ ||
५२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाः सर्वगुणैर्युक्ताः स्वं स्वं स्थानं प्रपेदिरे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
सर्वाः सात्वतमास्थाय़ विधिं चक्रे समाहितः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
सर्वाः स्वानालय़ान्यान्तु एका मामुपतिष्ठतु |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते |
१३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वाङ्गरूपो माय़ावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ||
९७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमाच्छिद्य केवलम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सर्वाञ्जनपदान्सूत योधा दुर्योधनस्य ये |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाञ्जनान्सर्वकामैः समृद्धैः समतर्पय़त् ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
सर्वाणि कर्माणि पुरा कृतानि; शुभाशुभान्यात्मनो यान्ति जन्तोः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
८३
इन्द्र उवाच
सर्वाणि कर्माणि समाप्य राज; न्गृहान्परित्यज्य वनं गतोऽसि |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणाम् |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
सर्वाणि च हवींष्यस्य देवा भागमकल्पय़न् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
सर्वाणि चैतानि मनोनुगानि; वुद्धिं मनोऽन्वेति मनः स्वभावम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ||
४ ख