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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां वचने तिष्ठन्यशः प्राप्स्यसि भारत ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां हर्षजननः पुण्यः श्रुतिसुखावहः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
सुहृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणय़मीप्सितम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
सुहृदां हितकामानां व्रुवतां तत्तदेव च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
सुहृदात्मसमो राज्ञः स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
सुहृदामप्यवाचीनस्त्यक्तधर्मः प्रिय़ानृतः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
सुहृदामप्रमत्तानामप्रमोक्ष्यार्थहानिजम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदामर्थकामानां यो न तिष्ठति शासने |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
सुहृदामविरोधेन तेनासि हरिणः कृशः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
सुहृदो नन्दय़िष्यामि पातय़िष्यामि सैन्धवम् ||
४६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदो भृशसंविग्नाः सान्त्वय़ां चक्रिरे तदा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
सुहृद्भवान्मम मतः सुहृदां च मतः सुहृत् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
सुहृद्भिः क्षिप्यमाणोऽपि नैवामुञ्चत तां तदा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
सुहृद्भिः स निवार्यस्ते विचित्तस्येव भेषजैः ||
१३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृद्भिः सर्वतो गुप्तः सुखं शक्ष्यसि जीवितुम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजा न रिष्यते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
सुहृद्भिरभ्यनुज्ञातौ दैत्यवृद्धैश्च मन्त्रिभिः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
सुहृद्भिर्वार्यमाणश्च पण्डितैश्च द्विजोत्तम |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुरावभौ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्डितैश्चापि भारत ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
सुहृद्भिस्तादृशैर्हीनः पुत्रैर्भ्रातृभिरेव च |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सुहृद्भूत्वा रिपुः किं मां कृष्णाभ्यां भीषय़न्नसि ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
सुहृद्भूत्वानुशास्मि त्वा कृपा हि त्वय़ि मे द्विज |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
सुहृद्भ्राता च मित्रं च सम्वन्धी च तवाच्युतः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजय़न्मुदा; जिते वलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
सुहृन्मित्रविनाशश्च दैवय़ोगादुपागतः |
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यवन्धुषु |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
विश्वामित्र उवाच
सुहृन्मे त्वं सुखेप्सुश्चेदापदो मां समुद्धर |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहोत्रं चेद्वैतिथिनं मृतं सृञ्जय़ शुश्रुम |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
सुहोत्रं रन्तिदेवं च कक्षीवन्तं तथौशिजम् ||
१६६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपय़ेमे सुवर्णां नाम |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहोत्रः पृथिवीं सर्वां वुभुजे सागराम्वराम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुय़जुस्तथा |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
सुह्मानङ्गांश्च पुण्ड्रांश्च निषादान्वङ्गकीचकान् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सुह्मानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
सुय़ुक्तचारो नृपतिः सर्वं धर्मेण पश्यति |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ुक्तमावेदय़दच्युताय़; कृताञ्जलिर्दारुको राजसिंह ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुक्तमास्थाय़ रथं हि काले; धनुर्विकर्षञ्शरपूर्णमुष्टिः |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धमर्जुनस्यासीदहं तु द्रोणमन्वगाम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धे राजशार्दूल यशो भीष्मं गमिष्यति ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धेन ततः प्राणानुत्स्रष्टुमुपचक्रमे ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धेन ततः स्वर्गं प्राप्स्यामि न तदन्यथा ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
दुर्योधन उवाच
सुय़ुद्धेन दशाहानि पालिताः स्मो महात्मना ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धेन पराँल्लोकानीप्सन्तः कीर्तिमेव च ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
सुय़ुद्धेन पराक्रान्ता नराः स्वर्गमभीप्सवः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधन किमर्थोऽय़मारम्भोऽप्सु कृतस्त्वय़ा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
सुय़ोधनं च राजानं सैन्धवं च जय़द्रथम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनं चापि रणे हनिष्यति वृकोदरः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
सुय़ोधनं समाश्रित्य तपेरन्पृथिवीमिमाम् ||
५ ख