वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
चर्मण्वतीं समासाद्य निय़तो निय़ताशनः |
७३ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
चर्मण्वत्याश्च यमुनां ततो गङ्गां जगाम ह ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
चर्मनिस्त्रिंशय़ो राजन्निर्विशेषमदृश्यत ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशय़ः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
चर्मवर्मप्लवां घोरां केशशैवलशाड्वलाम् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
चर्मवर्माणि सञ्छिन्द्य निर्वापमिव देहिनाम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
चर्मवल्कलसंवीतः स्वय़ं प्रातरुपस्पृशेत् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
चर्माच्छिनदसिं चास्य खण्डय़ामास संय़ुगे |
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
चर्माणि चापविद्धानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
चर्माणि वर्माणि मनोरथांश्च; प्रिय़ाणि सर्वाणि शिरांसि चैव |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
चर्माथादत्त गाङ्गेय़ो जातरूपपरिष्कृतम् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
चर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषय़ोः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
चर्याय़ां हय़मुत्सृष्टं पाण्डवस्यानुगच्छतः |
२०८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
चलं यथा दृष्टिपथं परैति; सूक्ष्मं महद्रूपमिवाभिपाति |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
चलचित्तमनात्मानमिन्द्रिय़ाणां वशानुगम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
चलचित्तस्य वै पुंसो वृद्धाननुपसेवतः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
चलतस्तस्य काय़ात्तु शिरो ज्वलितकुण्डलम् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
चलत्पताकैः प्रमुखैर्हेमकक्ष्यातनुच्छदैः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षेपसर्गय़ोः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
चलाचलमिति प्रोक्तं त्वय़ा तदपि मे शृणु ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
चलानि हीमानि षडिन्द्रिय़ाणि; तेषां यद्यद्वर्तते यत्र यत्र |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
चलामेव गतिं याति निरय़ं वाधिगच्छति ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
चलाश्च वाताः संवान्ति रूक्षाः परुषनिःस्वनाः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
धृतराष्ट्र उवाच
चलितानां द्रुतानां च कथमासीन्मनो हि वः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो; धर्मादपेतश्च कथं विवर्धेत् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
दुःषन्त उवाच
चलेद्धि वृत्ताद्धर्मोऽपि न चलेत्संशितव्रतः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
चलेद्धि हिमवाञ्शैलो मेदिनी शतधा भवेत् |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
अर्जुन उवाच
चलेद्धि हिमवान्स्थानान्निष्प्रभः स्याद्दिवाकरः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
चलोपपत्तिर्व्यक्तिश्च विसर्गः कल्पना क्षमा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
चषालो यस्य सौवर्णस्तस्मिन्यूपे हिरण्मय़े |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
चाक्षुषं वै द्वितीय़ं मे जन्म चासीत्पुरातनम् |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
चाणूरो देवरातश्च भोजो भीमरथश्च यः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
चातुराश्रम्य उक्तोऽत्र चातुर्वर्ण्यस्तथैव च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
चातुराश्रम्यधर्माश्च जातिधर्माश्च पाण्डव |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
चातुराश्रम्यधर्माश्च वेदधर्माश्च पार्थिव |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
चातुराश्रम्यपन्थानमाश्रय़त्याश्रमानपि |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
युधिष्ठिर उवाच
चातुराश्रम्यमुक्तं ते राजधर्मास्तथैव च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
चातुराश्रम्यमेकाग्रः चातुर्वर्ण्यं च पाण्डव |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
चातुराश्रम्ययुक्तेन कर्मणा कालय़ोगिना |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
चातुराश्रम्यवाह्याश्च श्रुतिवाह्याश्च ये नराः |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
चातुराश्रम्यसंसृष्टास्ते सर्वे विदितास्तव ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
चातुर्मास्यानि चैवासंस्तेषु यज्ञः सनातनः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
चातुर्मास्यावरं सम्यङ्निय़तं सम्प्रय़च्छसि ||
१०७ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्मास्येनाय़जन्त आर्षेण विधिना तदा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां यो निरग्रहः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
चातुर्मास्येषु पशवो वध्यन्त इति नित्यशः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
चातुर्मास्येषु यस्येष्ट्यामश्वमेधेऽग्रजः पशुः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
चातुर्मास्यैर्ये यजन्ते जनाः सदा; तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति |
३६ क