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आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
विविधानां च दानानां फलय़ोगाः पृथग्विधाः ||
२०२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
विविधानां च भूतानां त्वमुपास्यो भविष्यसि ||
६० ग
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
विविधानाश्रमान्कांश्चिद्द्विजातिभ्यः परिश्रुतान् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सुखकाङ्क्षय़ा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
विविधानि च जप्यानि विविधानि व्रतानि च ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
विविधानि च रक्षांसि क्षुधितान्यर्जुनं प्रति |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विविधानि च रूपाणि तत्रादृश्यन्त रक्षसाम् ||
१३० ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकशः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
विविधानि च शस्त्राणि चक्रुः सज्जानि सर्वशः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
विविधानि तवास्त्राणि सन्ति माय़ा च राक्षसी ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
विविधानि हरिष्यामः प्रतिपीड्य पुरं वलात् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
धृतराष्ट्र उवाच
विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवाः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
विविधानीह वृत्तानि व्राह्मणानां युधिष्ठिर ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुय़ाय़िनः |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
विविधान्यन्नपानानि विश्राम्यानुभवन्ति ते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
विविधान्युपवर्तन्ते गात्रसंस्पर्शजानि च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
विविधान्युपवर्तन्ते तथा सांस्पर्शकानि च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
विविधाभिश्च तां वाग्भिः पूजय़ामास माधवः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
विविधाभिस्तथाद्भिश्च सततं समलङ्कृतम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
विविधासु च शय़्यासु फलगृद्ध्यान्वितोऽफलः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
विविधास्तरणास्तीर्णं यत्रासातामरिन्दमौ ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
विविधास्तरणास्तीर्णमभ्युपाविशदच्युतः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
विविधास्त्वं श्रुतीर्वेत्थ वेत्थ वेदांश्च सर्वशः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
विविधाय़ुधपूर्णानि पताकाध्वजवन्ति च ||
१५ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
विविधाय़ुधसम्पन्नाश्चित्राभरणवर्मिणः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
विविधेनाभ्युपाय़ेन तेन मुच्येत किल्विषात् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
विविधै रथिनां श्रेष्ठाः सह सैन्यैः सहानुगैः |
७१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
विविधैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
विविधैः शोणितस्रावैः प्रशान्तं पुरुषर्षभ ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
विविधैरतिनिर्विद्धैः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
विविधैराय़ुधैश्चान्यैः संवृता भूरशोभत ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
विविधैरिषुजालैश्च नानाशस्त्रैश्च संय़ुगे ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
विविधैर्विस्मय़ं जग्मुस्तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
श्रीकृष्ण उवाच
विविधैश्च परिस्तोमैरश्वानां च प्रकीर्णकैः ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
विविधैस्तत्परैः सम्यक्तज्ज्ञैर्निपुणसंवृतैः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
विविन्ध्यं निहतं दृष्ट्वा तां च विक्षोभितां चमूम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
विविशुः कर्णमासाद्य भिन्दन्त इव जीवितम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
विविशुः क्रमशो वीरा अरण्यं शुभकाननम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
विविशुः पुत्रमादाय़ नगरं हृष्टमानसाः |
११६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
विविशुः शिविराण्याशु द्रव्यवन्ति सहस्रशः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
विविशुः सर्वतः पार्थं वासाय़ेवाण्डजा द्रुमम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
विविशुः सहिता राजन्पुरं वारणसाह्वय़म् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
समुद्र उवाच
विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
विविशुर्धरणीं वाणाः सङ्क्रुद्धा इव पन्नगाः ||
४० ख