chevron_left  आय़ुधागारमाश्रित्यarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुधागारमाश्रित्य कारय़ेथा महाधनम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानां च निर्घोषः स्तनय़ित्नुसमोऽभवत् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानां च यद्वीर्यं द्रव्याणामर्जुनस्य च ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
आय़ुधानां च सर्वेषां शक्त्यृष्टिप्रासवर्मणाम् |
५६ क
विराट पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
आय़ुधानां वरो वर्जः ककुद्मी च गवां वरः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानां सम्पराय़े यन्मुच्येय़महं ततः |
९३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
आय़ुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
दुर्योधन उवाच
आय़ुधानामिय़ं चापि वृता त्वत्संमते गदा ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानि च निक्षिप्य सहिताः कुरुपाण्डवाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २०५
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुधानि च यत्रासन्पाण्डवानां महात्मनाम् |
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानि च सर्वाणि विस्रष्टुमुपचक्रमुः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानि च सर्वाणि सज्ज्यन्तां वै महारथे ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
आय़ुधानि च सर्वेषां वाहूनपि च भूषितान् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महाजवाः |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आय़ुरस्य निकृन्तामि प्रजामस्याददे तथा ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
आय़ुरादाय़ मर्त्यानां रात्र्यहानि पुनः पुनः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
आय़ुरारोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् |
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
आय़ुरारोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुर्दश सहस्राणि वर्षाणां तत्र भारत |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
आय़ुर्नसुलभं लव्ध्वा नावकर्षेद्विशां पते |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
आय़ुर्नूनं सुदीर्घं मे विहितं दैवतैः पुरा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
आय़ुर्मतङ्गो दत्तश्च द्रुपदो मत्स्य एव च ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
आय़ुर्वलं च वीर्यं च तस्य तेजश्च वर्धते ||
४८ ग
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ुर्वीर्यं च राजेन्द्र सम्यक्पूजानमस्कृताः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ुर्वीर्यमथो वुद्धिर्वलं तेजश्च पाण्डव |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
आय़ुर्वेदमधीय़ानाः केवलं सपरिग्रहम् |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
आय़ुर्वेदविदस्तस्मात्त्रिधातुं मां प्रचक्षते ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुश्च तस्माल्लेभे तं नहुषश्च ततो भुवि ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
गार्ग्य उवाच
आय़ुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशताय़ुतम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुषः प्रक्षय़ं गत्वा मृत्योर्वशमुपेष्यसि ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ुषः प्रक्षय़ाद्विद्यां न शक्ष्यन्त्युपशिक्षितुम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
आय़ुषश्च परं कालं लोके विज्ञाय़ तत्त्वतः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
आय़ुषस्तु चतुर्भागं व्रह्मचार्यनसूय़कः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
आय़ुषा चानरण्येन दिलीपरघुपूरुभिः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
आय़ुषा हि प्रकृष्टेन यदा नः खेद आविशत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
आय़ुषि क्षय़मापन्ने पञ्चत्वमुपगच्छति |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुषो नहुषः |
७ 7
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुषो नहुषः पुत्रो धीमान्सत्यपराक्रमः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
आय़ुषोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धं ह्रसत्विति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ुषोऽन्ते प्रहाय़ेदं क्षीणप्राय़ं कलेवरम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
आय़ुषोऽन्ते प्रहाय़ेदं क्षीणप्राय़ं कलेवरम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
आय़ुषोऽन्ते महाराज प्राप शक्रसलोकताम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
आय़ुषोऽपचय़ं कृत्वा मरणाय़ोपनेष्यति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
देवदूत उवाच
आय़ुषोऽर्धं प्रय़च्छस्व कन्याय़ै भृगुनन्दन |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ९
रुरुरु उवाच
आय़ुषोऽर्धं प्रय़च्छामि कन्याय़ै खेचरोत्तम |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
आय़ुष्प्रमाणं जीवन्ति नरा भरतसत्तम ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
आय़ुष्प्रमाणं जीवन्ति शतानि दश पञ्च च ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
आय़ुष्प्रमाणमारोग्यं धर्मतः कामतोऽर्थतः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
आय़ुष्मंस्त्वं मय़ा नित्यं रक्षितव्यस्त्वय़ाप्यहम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सूत उवाच
आय़ुष्मन्कतरेण त्वा प्रापय़ामि धनञ्जय़म् |
१८ क