chevron_left  विषय़ेष्विन्द्रिय़वशंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
विषय़ेष्विन्द्रिय़वशं मानवाः प्रहसन्ति तम् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
विषय़ैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
विषय़ो विषय़ित्वं च सम्वन्धोऽय़मिहोच्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
विषय़ो व्यथते राजन्सर्वः सस्थाणुजङ्गमः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
विषय़ोगाश्च ते सर्वे विदिताः शत्रुनाशनाः ||
१११ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
विषय़ोऽय़ं पुराणस्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
विसञ्चारि निरालम्वं पञ्चद्वारं चलाचलम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विसञ्ज्ञकल्पां रुदतीमपविद्धां प्रवेपतीम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
विसञ्ज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
विसञ्ज्ञा नाशकद्गर्भं सन्धारय़ितुमात्मना ||
५६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
विसञ्ज्ञा हतभूय़िष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
विसञ्ज्ञा हतभूय़िष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
विसञ्ज्ञान्भूमिपान्दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
विसञ्ज्ञावाहय़न्वाहान्न च द्वौ सह धावतः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
विसञ्ज्ञाश्चाभवन्केचित्केचिद्राजन्वितत्रसुः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
विसञ्ज्ञेव च दुःखेन तस्थौ स्थाणुरिवाचला ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
विसतन्तुप्रविष्टं च तत्रापश्यच्छतक्रतुम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
विसतन्तुर्यथैवाय़मन्तःस्थः सर्वतो विसे |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
विसर्गमधिभूतं च मित्रस्तत्राधिदैवतम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
विसर्गे च पुरीषस्य विसर्गे चाभिकामिके ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
विसर्गे चैव कौवेरे वारुणे चैव संय़मे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थमर्थार्थं कामहेतुना |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
विसर्जितः केशवेन रथोपस्थादवातरत् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
विसर्जितः स रामेण पितुर्वचनकारिणा |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद्व्रजामहे ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
विसर्जितास्मि भीष्मेण धर्मं मां प्रतिपादय़ |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
विसर्जितास्मि भीष्मेण श्रुत्वैव भृगुनन्दन |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
विसर्जिते ततः स्कन्दे वभूवौत्पातिकं महत् |
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
विसर्जय़न्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
विसर्जय़स्व मां व्रह्मन्न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ामास तदा द्विजांश्च प्रकृतीस्तथा ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विसर्जय़ामास तदा रत्नैः सन्तोष्य सर्वशः ||
५४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ामास तदा सर्वास्तु प्रकृतीः शनैः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
विसर्जय़ामास नृपं वृहद्रथमथारिहन् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ामास नृपान्व्राह्मणांश्च सहस्रशः ||
२३ ग
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ामास शनैर्वेपमानः पुनः पुनः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ित्वा मञ्जूषां सम्वोधनभय़ात्पितुः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ित्वा राधेय़ं सर्वय़ादवनन्दनः |
२८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
विसर्जय़ित्वा विप्रांस्तान्राजापि जनमेजय़ः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ित्वा स नृपान्भ्रातृभिः परिवारितः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
विसर्जय़ित्वा सधनं प्रविवेश स्वमालय़म् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
विसर्जय़ैतद्दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्जय़ैनं यात्वेष स्वराज्यमनुशासताम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
विसर्पमाणा भल्लैश्च वार्यन्ते सव्यसाचिना ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विससर्ज मुखात्क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः |
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
विससर्ज शरांश्चित्रान्सुवर्णविकृतान्वहून् ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
विससर्ज शरान्घोरांस्तेऽश्वत्थामानमाविशन् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
विससर्ज शरान्घोरान्सूतपुत्रं त आविशन् ||
३९ ख