शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं तु सर्वां महीं लव्ध्वा कुरुषे स्वय़मापदम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
त्वं तु सर्वातिशङ्कित्वान्निष्ठुरः पापनिश्चय़ः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
त्वं तु हित्वा सुखं राज्यं मित्राणि च धनानि च |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
त्वं तु हेतूनतीत्यैतान्कामक्रोधौ व्यतीत्य च |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं त्राता त्वं महद्व्रह्म त्वय़ि सर्वं प्रतिष्ठितम् |
१०३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
त्वं देविता त्वत्कृते राज्यनाश; स्त्वत्सम्भवं व्यसनं नो नरेन्द्र |
८७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं धर्ममर्थं युञ्जानः सम्यङ्नस्त्रातुमर्हसि |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२३
स्तम्वमित्र उवाच
त्वं धारय़सि भूतानि भुवनं त्वं विभर्षि च ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
त्वं धारय़सि लोकांस्त्रीन्क्रिय़ाणां च प्रवर्तकः |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
त्वं नः स्रष्टा च पाता च भर्ता च जगतः प्रभो |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भय़ैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
त्वं नस्त्राता विधाता च लोकानां लोकभावनः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
त्वं निवोध न चाप्यत्र कर्तव्या ते विचारणा ||
२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं नो गतिः प्रतिष्ठा च त्वदाय़त्तमिदं कुलम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
त्वं पञ्चमो भविता राजपुत्र; न चेत्प्रश्नान्पृच्छतो व्याकरोषि ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
त्वं पवित्रं यदा लोके सर्वभूतगतश्च ह ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं पाण्डवानां निपुणं वेत्थ सर्वं; किमेषां ज्याय़ः किमु तेषां कनीय़ः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
त्वं पापवुद्धेऽतिनृशंसकर्म; न्राज्यं कुरूणामनय़ाद्विहंसि ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्वं पुत्रस्तादृशीनां हि धर्मं वक्तुमिहेच्छसि ||
८६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
त्वं पुनः कारणैर्नूनं शल्मले रक्ष्यसे सदा |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
त्वं पुनः पण्डितो भूत्वा वाचं वक्तुमिहेच्छसि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन्कृपणं परितप्यसे |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
त्वं पुनः सूर्यसङ्काशः श्वोभूत उदिते रवौ |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
त्वं पुनः स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
त्वं पुनर्भ्रातृसहितः कृष्णय़ा चैव पाण्डव |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
त्वं प्रभुः सर्वलोकानां त्वय़ा सर्वमिदं ततम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
त्वं प्रभुस्तपनप्रख्यस्त्वं नस्त्राणमनुत्तमम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं प्रभुस्त्वं विभुस्त्वं भूरात्मभूस्त्वं सनातनः |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२८९
कुन्त्यु उवाच
त्वं प्रसन्नः पिता चैव कृतं विप्र वरैर्मम ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं प्रातिकामिन्द्रौपदीमानय़स्व; न ते भय़ं विद्यते पाण्डवेभ्यः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफलं कुरु ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
त्वं भीम रक्ष राजानमेतत्कार्यतमं हि ते ||
६६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
त्वं भूतानामधिपतिस्त्वय़ि लोकाः प्रतिष्ठिताः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं महद्भूतमाश्चर्यं त्वं राजा त्वं सुरोत्तमः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वं मा परिणते काले परीतं कालवह्निना |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेश्वर चक्षुषा ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं मां मूढेति वा मत्वा भक्ता वानुगतेति वा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
धृतराष्ट्र उवाच
त्वं मां यथावद्विदुर प्रशाधि; प्रज्ञापूर्वं सर्वमजातशत्रोः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वं मामभीक्ष्णं परिकीर्तय़न्वै; कृपस्य पादौ सञ्जय़ पाणिना स्पृशेः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
त्वं मामुपचरस्वेति नाचिकेतमभाषत |
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं मुहूर्तस्तिथिश्च त्वं लवस्त्वं वै पुनः क्षणः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
त्वं मय़ा याजितो राजंस्तस्येदं कर्मणः फलम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरय़ा सह |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वं वज्रमतुलं घोरं घोषवांस्त्वं वलाहकः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
मान्धातो उवाच
त्वं वन्धुभूतो ह्यस्माकं क्षत्रिय़ाणां सुरेश्वर ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
त्वं वर्षिष्यसि दिव्यानि शस्त्रवर्षाण्यनेकशः |
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञिय़ानां; यय़ातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
त्वं वाग्वलो भारत निष्ठुरश्च; त्वमेव मां वेत्सि यथाविधोऽहम् ||
८१ ख