chevron_left  स्वर्गवासंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
स्वर्गवासं समुद्दिश्य पितॄणां स नरोत्तमः ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
स्वर्गवासमभीप्सद्भिर्न सेव्यस्त्वत उत्तरः ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थाय़ समुत्पन्ना महामखे |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युय़ुधिरे तदा ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
स्वर्गस्था अपि ये केचित्तं नमस्यन्ति देहिनः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
स्वर्गस्य च गुणान्कृत्स्नान्दोषान्सर्वांश्च भारत |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
स्वर्गाच्चैवात्र भूलोकं तण्डिना ह्यवतारितः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
स्वर्गाच्च्युतश्चापि ततो नृलोके; कुले समुत्पत्स्यति गोमिनां सः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७
अगस्त्य उवाच
स्वर्गाद्भ्रष्टो दुराचारो नहुषो वलदर्पितः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
स्वर्गारोहणिकं पर्व ततो भीष्मस्य धीमतः ||
६५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
स्वर्गार्गलं लोभवीजं रागगुप्तं दुरासदम् ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
स्वर्गार्थं मित्रकार्यार्थं नाभ्यरक्षन्त जीवितम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गाय़ चाहुर्हि हिरण्यदानं; ततो विशिष्टं कनकप्रदानम् ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
कृप उवाच
स्वर्गाय़ापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
स्वर्गाय़ाभिमुखः प्राय़ाल्लोकानां हितकाम्यया ||
१४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
जनमेजय़ उवाच
स्वर्गे कालं किय़न्तं ते तस्थुस्तदपि शंस मे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
स्वर्गे कृतावकाशस्य तस्य नास्ति महद्भय़म् ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
स्वर्गे क्रतुफलं सद्भिर्दक्षिणा शान्तिरुच्यते |
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
स्वर्गे तथा प्रमोदन्ते तपसा विक्रमेण च ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तद्व्रवीमि वः ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गे निवासो राजेन्द्र विरुद्धं चापि नश्यति ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
स्वर्गे प्रवृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ||
११० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
स्वर्गे मृतानां भवति सहधर्मः पितामह |
४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
इन्द्र उवाच
स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्य; मिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
स्वर्गे स विपुलं स्थानं प्राप्नुय़ान्नात्र संशय़ः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
स्वर्गे स्वर्गसुखं किं च दोषो वा देवदूतक ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
स्वर्गो विमानसंय़ुक्तो वेददृष्टः सुपुष्पितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
स्वर्गोद्देशस्त्वय़ा राजन्सशरीरेण पार्थिव |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गोपमं शैलमिमं चरद्भिः; शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् ||
२७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गोऽय़ं नेह वैराणि भवन्ति मनुजाधिप ||
१८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गोऽय़ं पश्य देवर्षीन्सिद्धांश्च त्रिदिवालय़ान् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्ग्यं लोक्यं च मामात्थ धर्म्यं न्याय़्यं च केशव ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
स्वर्ग्यमारोग्यमाय़ुष्यं धन्यं वल्यं तथैव च ||
१६९ ग
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
स्वर्गय़ोनिर्जय़ो राजन्स्वर्गय़ोनिर्महद्यशः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
स्वर्गय़ोनिस्तपो युद्धे मार्गः सोऽव्यभिचारवान् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णदण्डां महाघोरामष्टघण्टां भय़ावहाम् ||
२८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां तैलधौतां सुनिर्मलाम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खाः सुनिशिताः कर्णचापच्युताः शराः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाधौतान्यमदण्डोपमान्मृधे ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खैः प्रकाशद्भिर्व्यरोचन्त दिशस्तथा ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैः कङ्कवर्हिणवाजितैः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैः प्राणान्तकरणैर्युधि ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैरा कर्णात्प्रहितैः शरैः ||
४ ग
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैर्धनुर्यन्त्रप्रचोदितैः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८३
सनत्कुमार उवाच
स्वर्णेता सहजिद्वभ्रुरिति राजाभिधीय़ते ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्भानवीसुतानेतानाय़ोः पुत्रान्प्रचक्षते ||
२३ ख