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कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् |
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
समाधानं च भार्याय़ा लेभे स तपसा परम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
समाधावचला वुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||
५३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
समाधाय़ मनो धीमान्धर्मात्मा पुरुषर्षभः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
समाधाय़ शरीरपरित्यागं चकार ||
२६ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
समाधाय़ेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
समाधिं कुरुताव्यग्रास्तीर्थान्येतानि द्रक्ष्यथ ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
समाधिः सत्पथस्थानं यथोदितनिषेवणम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
भीष्म उवाच
समाधिनोपशिक्षन्तो व्रह्मलोकं सनातनम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
शम्वर उवाच
समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तय़न् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
समाधिर्नास्य मानार्थे नात्मानं स्तौति कर्हिचित् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
समाधीनां समासस्तु पाण्डवेय़ श्रुतस्त्वय़ा |
१६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
समाधेय़ास्त्वय़ा वीर त्वय़्यद्य कुलधूर्गता ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
समाधौ योगमेवैतच्छाण्डिल्यः शममव्रवीत् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
समान न त्वं श्रेष्ठोऽसि व्यान एव वशे तव ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
समानं धर्मकुशलाः स्थापय़न्ति नरेश्वर ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
समानः प्रचचाराथ उदानस्तमुवाच ह |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
समानजन्ममरणः समः सर्वगुणैर्नृणाम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
समानतेनेष्वसनेन कूजता; भृशाततेनामितवाणवर्षिणा |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
समानपद्ये षण्मासान्स्थितो विद्यां लभेदिमाम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
समानपृष्ठोदरपाणिपादाः; पश्चाच्छूरं भीरवोऽनुव्रजन्ति |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
समानमृत्यवो भूत्वा धृष्टद्युम्नं समन्वय़ुः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
समानमृत्यवो राजन्ननीकस्थाः परस्परम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
समानमेकपङ्क्त्यां तु भोज्यमन्नं नरेश्वर |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
समानमेतदमृतस्य विद्या; देवंय़ुक्तो मधु तद्वै परीप्सेत् |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां शवलां धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
समानवत्साः पय़सा समन्विताः; सुवर्णकांस्योपदुहा न तेन ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
समानव्यानजनिते सामान्ये शुक्रशोणिते ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
समानव्यानय़ोर्मध्ये प्राणापानौ विचेरतुः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
समानव्रतचर्या च वभूवाय़तलोचना ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योऽन्वजाय़त |
३० क
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
समानवय़सः सर्वानाश्लिष्य स पुनः पुनः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
समानश्चाप्युदानश्च वचोऽव्रूतां ततः शुभे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
समानसारवीर्या च तपस्तीव्रं कृतं च ते |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
समानसुखदुःखं तं पृच्छेदर्थेषु मानवम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
समानां श्रद्दधानानां संय़तानां सुचेतसाम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
समानाशनपानास्ते कार्या द्विगुणवेतनाः ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
समानाय़्य महातेजाः सर्वान्भ्रातॄन्महामनाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
समानि येषां स्थिरविक्रमाणां; वुद्धात्मनां सत्त्वमवस्थितानाम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २७९
मार्कण्डेय़ उवाच
समानिन्ये च तत्सर्वं भाण्डं वैवाहिकं नृपः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
समानीतानि कालेन किं ते वै जात्ववान्धवाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
समानीय़ ततो यज्ञं दैवतं समपूजय़त् ||
५४ ग
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
समानीय़ तदा विद्वान्द्रुपदस्यासुखाय़ वै ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
समानीय़ पाण्डवान्सृञ्जय़ांश्च; जनार्दनं युय़ुधानं विराटम् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
समानीय़ महीपालानिदं वचनमव्रवीत् ||
७ ख