chevron_left  अग्निमारुतसंय़ोगात्ततःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
अग्निमारुतसंय़ोगात्ततः समभवन्मही ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २४
विनतो उवाच
अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निराग्रय़णो नाम भानोरेवान्वय़स्तु सः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निराङ्गिरसश्चैव च्यवनस्त्रिषुवर्चकः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
अग्निरात्मभवं प्रादाद्यत्र वाञ्छति नैषधः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
अग्निरात्मा च माता च पिता जनय़िता तथा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निरापस्तथाकाशं पृथिवी वाय़ुरेव च |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
अग्निराशिरिवोद्भासन्समिद्धोऽतिभय़ङ्करः |
५ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अग्निरास्यं क्षितिः पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अग्निरित्येव तत्प्राहुः प्रदानं वै सुखावहम् |
६७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अग्निरिन्द्रश्च सोमश्च पवनश्च दिशो दश |
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
अग्निरेष महार्चिष्माञ्जागर्ति वरुणह्रदे |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
अग्निर्जरय़ते चापि पञ्चाग्नेय़ाः शरीरिणः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
अग्निर्जरय़ते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
अग्निर्ज्ञेय़ो गृहपतिः स सप्तदश उच्यते |
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तराय़णम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १३४
अष्टावक्र उवाच
अग्निर्दहञ्जातवेदाः सतां गृहा; न्विसर्जय़ंस्तेजसा न स्म धाक्षीत् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
अग्निर्दहेत्तथा सेनां मामिकां स धनञ्जय़ः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
अग्निर्दारुगतो यद्वद्भिन्ने दारौ न दृश्यते |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
अग्निर्भूतपतिर्नित्यं व्राह्मणानां वृहस्पतिः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्भूत्वा नैगमेय़श्छागवक्त्रो वहुप्रजः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
अग्निर्मित्रो योनिरापोऽथ देव्यो; विष्णो रेतस्त्वममृतस्य नाभिः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
अग्निर्मुखं पुरोधाश्च देवानां शुचिपाद्विभुः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्यच्छति भूतानि येन भूतानि नित्यदा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २०७
युधिष्ठिर उवाच
अग्निर्यदा त्वेक एव वहुत्वं चास्य कर्मसु |
३ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्यस्तु शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
अग्निर्वै देवताः सर्वा इति वेदस्य शासनम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
अग्निर्वैश्वानरो मध्ये सप्तधा विहितोऽन्तरा ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
अग्निर्व्रह्मा पशुपतिः शर्वो रुद्रः प्रजापतिः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो माय़ाश्च मय़जा विभो |
४ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||
११९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
अग्निवच्चोपचर्या वै व्राह्मणाः कुरुसत्तम ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
अग्निवत्समरे तात चरिष्यति न संशय़ः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
अग्निवत्समरे तात चरिष्यति विमर्दय़न् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
अग्निवर्णं महावेगं जाम्वूनदपरिष्कृतम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
अग्निवर्णा जटास्तात प्रकाशन्ते महात्मनः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
अग्निवर्णा यथा भासः शस्त्राणामुदकस्य च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
अग्निवर्णो ज्वलन्धीमान्स द्विजो रथधुर्यवत् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
अग्निवेश्यं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
अग्निवेश्यो मम प्रादात्तेन वध्नामि वर्म ते |
६७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
अग्निवेष्या जगत्तुण्डाः पलदाशाश्च भारत |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानवहिष्कृताः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
अग्निश्च परमां प्रीतिमवाप हतकल्मषः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
अग्निश्च वडवावक्त्रो भूत्वाहं द्विजसत्तम |
१२ क