chevron_left  तदेतत्सर्वमाचक्ष्वarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
तदेतत्सर्वमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यताम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
जनमेजय़ उवाच
तदेतदद्भुतं व्रह्मञ्शार्ङ्गानामविनाशनम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
तदेतदद्यापि वडवामुखसञ्ज्ञितेनानुवर्तिना तोय़ं सामुद्रं पीय़ते ||
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तदेतदार्षं माद्रेय़ प्रमाणं कर्तुमर्हसि |
८५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
तदेतदुत्तमं धर्ममहिंसालक्षणं शुभम् |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
तदेतदुपशान्तेन दान्तेनाध्यात्मशीलिना |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
तदेतदुपशान्तेन वोद्धव्यं शुचिकर्मणा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
तदेतदृषिणा प्रोक्तं विस्तरेणानुमीय़ते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
तदेतद्गुणसर्गाय़ विकुर्वाणं पुनः पुनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
तदेतद्भस्मसाद्भूतं जगत्सर्वमुपप्लुतम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तदेतद्वै समालोक्य प्रत्यमित्रं महद्वलम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
तदेतन्नरशार्दूल हृदि त्वं कर्तुमर्हसि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
तदेतन्मे यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
तदेतरं विजानाति आत्मानं नेतरं जनम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्निः स्थितो भवेत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
तदेनं त्वं वारय़ितुमर्हसि तथा यथास्मान्भजेदिति ||
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
महेश्वर उवाच
तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जय़म् |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तदेव काल आरव्धं महतेऽर्थाय़ कल्पते ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तदेव कुरु धर्मज्ञ मदर्थं यद्यदुच्यसे ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
तदेव क्रिय़तामाशु न विचार्यमतस्त्वय़ा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
तदेव च यथा सूत्रं सुवर्णे वर्तते पुनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तदेव च यथा स्रोतो विष्टम्भय़ति वारणः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
तदेव च विनिश्चित्य ददृशुः कुरुसत्तमम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
तदेव चिन्तय़ामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
तदेव ज्ञानय़ुक्तस्य मुनेर्धर्मो न हीय़ते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
तदेव तत्र दर्शनं कृतज्ञमर्थसंहितम् ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तदेव तव पुत्रस्य राजन्दुर्द्यूतदेविनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
तदेव तस्य यौतकं भवत्यमुत्र गच्छतः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
तदेव तावद्गाङ्गेय़ श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तदेव ते भवत्वद्य शश्वच्च भरतर्षभ ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
कापव्य उवाच
तदेव तेऽनु मीय़न्ते कुणपं कृमय़ो यथा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तदेव त्वामनुप्राप्तं वचनं साधु भाषितम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तदेव दुःखं ध्याय़न्तः सौभद्रगतमानसाः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
तदेव धारय़ेन्नित्यमेवं प्रिय़तरो भवेत् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तदेव नगरश्रेष्ठं प्रशासन्तमरिन्दमम् ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
तदेव निन्दन्नासीत श्रद्धा वान्यत्र गृह्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
तदेव परितापार्थं सर्वं सम्पद्यते तदा ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
तदेव परितापाय़ नाशे सम्पद्यते पुनः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
तदेव पुलिनं नद्याः प्रय़यौ व्राह्मणर्षभः ||
१३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तदेव प्राप्तुमिच्छामि लोकानन्यान्न कामय़े ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
तदेव मङ्गलं सर्वं लोकः समनुवर्तते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
तदेव मध्याः सेवन्ते मेधावी चाप्यथोत्तरम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
तदेव मे दर्शय़ देव रूपं; प्रसीद देवेश जगन्निवास ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
तदेव राज्ञां परमं पवित्रं जनमेजय़ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
तदेव वन्ध्यं दिवसमिति विद्याद्विचक्षणः ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
तदेव वहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
तदेव वाक्यं वैदर्भी श्रोतुमिच्छत्यनिन्दिता ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
तदेव विदुरोऽप्याह भीष्मो द्रोणश्च मां मुने ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
तदेव विषमस्थस्य स्वजनोऽपि न मृष्यते ||
३ ख