शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्वुधाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
दण्डकानां महद्राज्यं व्राह्मणेन विनाशितम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
दण्डकारण्यमासाद्य महाराज उपस्पृशेत् |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमातुरा ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजेश्वरः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डधारणमत्युग्रं प्रजानां परिपालनम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
दण्डधारणमुग्रत्वं प्रजानां परिपालनम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
दण्डधारो महाराज रथ एको नरर्षभः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कार्त्स्न्येन भूमिपः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीतिं पुरस्कृत्य विजानन्क्षत्रिय़ः सदा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
दण्डनीतिः स्वधर्मेण चातुर्वर्ण्यं निय़च्छति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं निय़च्छति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभय़े ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डनीतिमृते चापि निर्मर्यादमिदं भवेत् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
दण्डनीतिरिति प्रोक्ता त्रीँल्लोकाननुवर्तते ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
दण्डनीतिर्जगद्धात्री दण्डो हि वहुविग्रहः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
दण्डनीतिश्च राजा च समस्तौ तावुभावपि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
दण्डनीतिश्च विपुला विद्यास्तत्र निदर्शिताः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
दण्डनीतिस्त्रय़ी विद्या तेन लोका भवन्त्युत ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
दण्डनीत्या च सततं रक्षितं तं नरेश्वर |
१३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीत्या यदा राजा त्रीनंशाननुवर्तते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
दण्डनीत्या यदा राजा सम्यक्कार्त्स्न्येन वर्तते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डनीत्यां प्रणीताय़ां सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक्कार्त्स्न्येन वर्तते |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्ययुध्यत ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
दण्डपाणिरिवासह्यः कालवत्प्रचरिष्यति ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
दण्डपाणिरिवासह्यो मृत्युः कालेन चोदितः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
दण्डपाणिर्यथा गोषु पालो नित्यं स्थिरो भवेत् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
दण्डप्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मकः स्मृतः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
दण्डमर्हन्ति दुष्यन्ति दुष्टाश्चाप्यपकुर्वते ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डवाहुः सुवाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विभजन्साध्वसाधुनी ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके व्यनशिष्यन्निमाः प्रजाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डस्य हि भय़ाद्भीतो भोगाय़ेह प्रकल्पते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डस्यैव भय़ादेके न खादन्ति परस्परम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डस्यैव भय़ादेते मनुष्या वर्त्मनि स्थिताः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
दण्डहस्तं यथा क्रुद्धमन्तकं प्राणहारिणम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
दण्डात्त्रिवर्गः सततं सुप्रणीतात्प्रवर्तते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
दण्डार्कमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ||
१४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
दण्डिने तप्ततपसे तथैव क्रूरकर्मणे |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
दण्डी मुण्डी कुशी चीरी घृताक्तो मेखली तथा ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डीव यूथादपसेधसे त्वं; यो जेतुमाशंससि धर्मराजम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डे स्थिताः प्रजाः सर्वा भय़ं दण्डं विदुर्वुधाः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डे स्वर्गो मनुष्याणां लोकोऽय़ं च प्रतिष्ठितः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
दण्डेन नीय़ते चेय़ं दण्डं नय़ति चाप्युत |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डेन रक्ष्यते धान्यं धनं दण्डेन रक्ष्यते |
४ क