आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादय़त् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
सत्कृत्य तु द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिप |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्य ते तां सरितं ततः कृष्णमुखा नृपाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
सत्कृत्य परिपृष्टः सन्सुमहात्मा महातपाः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्य पूजय़ित्वा च विससर्ज नराधिपान् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
सत्कृत्य भोजय़ामास सम्यक्परिचचार च ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
सत्कृत्य विधिवद्द्रोणं जितान्मन्यन्त पाण्डवान् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
सत्कृत्य शङ्करं प्राह व्रह्मा लोकहितं वचः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सत्कृत्य शरभङ्गं स दण्डकारण्यमाश्रितः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
सत्कृत्य स तथा विप्रमिदं वचनमव्रवीत् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
सत्कृत्य सत्कृतस्तेन पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्याचक्षते चान्ये तथैवान्ये समागताः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
सत्कृत्यानुव्रजेद्यश्च तस्य धर्मः सनातनः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृत्यामन्त्रिताः सर्वे आचार्यप्रमुखा नृपाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
सत्त्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद्द्वय़मप्यनुदर्शितम् ||
३१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
सत्त्वं च पुरुषश्चैकस्तत्र नास्ति विचारणा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सत्त्वं दशगुणं ज्ञात्वा रजो नवगुणं तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
सत्त्वं देवगुणं विद्यादितरावासुरौ गुणौ ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सत्त्वं मनः संसृजति न गुणान्वै कदाचन ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चेति त्रय़स्त्वात्मगुणाः स्मृताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चेति देवासुरगुणान्विदुः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव अधश्चोर्ध्वं त्वमेव हि ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणसर्गः सनातनः ||
२१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणानेतान्प्रचक्षते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव धर्मार्थौ काम एव च |
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव मानसाः स्युस्त्रय़ो गुणाः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
सत्त्वं वलं च कालं चाप्यविदित्वात्मनस्तथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सत्त्वं वहति शुद्धात्मन्परं नाराय़णं प्रभुम् |
७४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
सत्त्वं वैकारिकं योनिरिन्द्रिय़ाणां प्रकाशिका |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
सत्त्वं सञ्जाय़ते तस्य यत्र प्रक्षिप्यते हविः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सत्त्वं सत्त्वेन योगज्ञा प्रविवेश महीपते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
सत्त्वं सुखे सञ्जय़ति रजः कर्मणि भारत |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
सत्त्वं हि तेजः सृजति न गुणान्वै कदाचन ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वं हि मूलमर्थस्य वितथं यदतोऽन्यथा |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सत्त्वकर्मान्वय़ैर्वुद्ध्या प्रकृत्या यशसा श्रिय़ा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मय़ोः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मय़ोः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोश्चैव सम्वन्धः केन हेतुना ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सत्त्वतः सात्वतस्तस्मादार्षभाद्वृषभेक्षणः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
सत्त्वत्यागात्तु मात्सर्यमहितानि च सेवते |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैकः प्रवर्तकः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
सत्त्वमात्मा प्रसवति गुणान्वापि कदा च न |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
सत्त्वमानन्द उद्रेकः प्रीतिः प्राकाश्यमेव च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
सत्त्वमिच्छसि सन्तोषाच्छान्तिलक्षणमुत्तमम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सत्त्ववन्तममन्यन्त साक्षादिव धनञ्जय़म् ||
१५ ख