भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः कार्मुकैः खड्गैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः क्षत्रिय़ाः शूरा वाग्भिः शूरा द्विजातय़ः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
वाहुभिः परिगृह्णीतां शोचन्तौ सहितावुभौ ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभिः समसज्जेतामाय़सैः परिघैरिव ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः समसज्जेतामाय़सैः परिघैरिव ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
वाहुभिः समसज्जेतामुभावपि वलान्वितौ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभिः समसज्जेतामुभौ रक्षोवृकोदरौ ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः समय़ुध्यन्त समवेताः परस्परम् ||
७७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः समय़ुध्यन्त सृञ्जय़ाः कुरुभिः सह ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः सुभुजाच्छिन्नैः पार्श्वेषु च विदारिताः |
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिः स्वाय़तैः पीनैर्नानाप्रहरणोद्यतैः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्च तलैश्चैव निस्त्रिंशैश्च सुसंशितैः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्च शिरोभिश्च वीराणां समकीर्यत ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभिश्च सकेय़ूरैर्विचित्रैश्च महारथैः |
५२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभिश्च सखड्गैश्च शिरोभिश्च सकुण्डलैः |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्चन्दनादिग्धैः सकेय़ूरैर्महाधनैः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैः शुभभूषणैः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैश्च विशां पते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
वाहुभिश्चरणैश्छिन्नैः शिरोभिश्चारुकुण्डलैः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
वाहुभ्यां क्षत्रिय़ः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य उच्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
वाहुभ्यां क्षत्रिय़शतं वैश्यानामूरुतः शतम् |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां परिजग्राह समुपेत्य वृकोदरः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्रावोधय़दनिन्दिता |
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
वाहुभ्यां पीनवृत्ताभ्यां प्रय़त्नाद्वलवद्वली ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
दम्भोद्भव उवाच
वाहुभ्यां मे जिता भूमिर्निहताः सर्वशत्रवः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
वाहुभ्यां युध्यमानस्य कस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
वाहुभ्यां रोदसी विभ्रन्महावाहुरिति स्मृतः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
वाहुभ्यां वाच उदरादुपस्था; त्तेषां द्वारं द्वारपालो वुभूषेत् ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
वाहुभ्यां सम्परिष्वक्तं स्त्रिय़ा परमघोरय़ा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमव्रवीत् ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्याजिघ्रत पाण्डवम् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां सम्परिष्वज्य समुन्नाम्य च पुत्रकम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यां साधुजाताभ्यां दुःशासनमरिन्दमम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
वाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
वाहुभ्यामिन्द्रमित्याहुरुरसा रुद्रमेव च ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
वाहुभ्यामिव सन्तीर्णौ सिन्धुषष्ठाः समुद्रगाः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
वाहुभ्यामुद्धरेद्भूमिं दहेत्क्रुद्ध इमाः प्रजाः |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुभ्यामुद्धरेद्भूमिं दहेत्क्रुद्ध इमाः प्रजाः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
वाहुभ्यामुद्वहेद्भूमिं दहेत्क्रुद्ध इमाः प्रजाः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
वाहुभ्यामेव संमोहाद्वधं चर्च्छत्यसंशय़म् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
वाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीय़ामिति कामय़े |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
मुचुकुन्द उवाच
वाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीय़ामिति कामय़े ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
वाहुवीर्यार्जिता भूमिस्तव पार्थैर्निवेदिता |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
वाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
वाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
वाहुवीर्याश्रय़े मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णय़े ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
वाहुवीर्ये समो नास्ति मद्रराजस्य कश्चन |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वाहुशव्देन चोग्रेण नर्दन्तीव गिरेर्गुहाः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
वाहुशव्देन पृथिवीं कम्पय़ामास पाण्डवः ||
६५ ख