स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैः कवचैर्निष्कैर्मणिभिश्च महात्मनाम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
काञ्चनैः कवचैर्वीरा ज्वलनार्कसमप्रभैः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः |
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
काञ्चनैः कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्वुदाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैः स्फाटिकाकारैर्वेश्मभिः समलङ्कृतम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलङ्कृतम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैर्विमलैः पद्मैर्ददर्श विपुलां नदीम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
काञ्चनैर्विविधैर्भाण्डैराच्छन्नान्हेममालिनः |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
काञ्चनोपलसङ्घातैः सदृशं श्लिष्टसन्धिकम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनौदुम्वरास्तत्र राजताः पृथिवीमय़ाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र विवोध्यते ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
काञ्चीनूपुरशव्देन सुप्तश्चैव प्रवोध्यते ||
५३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
कादम्वकारण्डवहंसजुष्टाः; पद्माकुलाः पुष्करिणीरपश्यन् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
काद्रवेय़ा वैनतेय़ा गन्धर्वाप्सरसस्तथा |
४० क
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
काननाश्च विकुञ्जाश्च मुक्ताः पुण्ड्राविषस्तथा |
९ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
काननेषु च रम्येषु पर्वतेषु नदीषु च |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
काननेषु च रम्येषु विजह्रुर्मुदिता जनाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
काननेष्विव पुष्पाणि वर्हीवार्थान्समाचरेत् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
जनक उवाच
कानि कर्माणि धर्म्याणि लोकेऽस्मिन्द्विजसत्तम |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
कानि कृत्वेह कर्माणि प्राय़श्चित्तीय़ते नरः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
कानि चाभ्यवहार्याणि तत्र तेषां महात्मनाम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
युधिष्ठिर उवाच
कानि दानानि लोकेऽस्मिन्दातुकामो महीपतिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
कानि पण्यानि विक्रीणन्स्वर्गलोकान्न हीय़ते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
अम्वरीष उवाच
कानि यज्ञे हवींष्यत्र किमाज्यं का च दक्षिणा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
कानि रूपाणि शक्रस्य भवन्त्यागच्छतो मुने |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
इन्द्र उवाच
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
जनमेजय़ उवाच
कानि वा व्रजतस्तस्य निमित्तानि महौजसः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
युधिष्ठिर उवाच
कानि श्राद्धेषु वर्ज्यानि तथा मूलफलानि च |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
धृतराष्ट्र उवाच
कानि सान्त्वानि गोविन्दः सूतपुत्रे प्रय़ुक्तवान् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
कानिचिद्यानि दुर्गाणि दुष्कृतानि कृतानि च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
कानीनगर्भः पितृकन्यकाय़ां; तस्मादृषेस्त्वं भविता च पुत्रः ||
४८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
कानीनश्च सहोढश्च कन्याय़ां यश्च जाय़ते |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
कानीनस्त्वं मय़ा जातः पूर्वजः कुक्षिणा धृतः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
कानीनाध्यूढजौ चापि विज्ञेय़ौ पुत्रकिल्विषौ |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं; सन्तिष्ठती कानि न सेवसे त्वम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
कान्ता दिव्याश्च राजेन्द्र प्रीतिहर्षमुदा युताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
कान्ताभिः सहितानन्यानपश्यन्रमतः सुखम् |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान्ददर्श ह |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
कान्तारवनदुर्गेषु कृच्छ्रास्वापत्सु सम्भ्रमे |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
कान्तारे व्राह्मणान्गाश्च यः परित्राति कौशिक |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कान्तारेष्वपि विश्रामो नरस्याध्वनिकस्य वै |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसोपमम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वाय़ोः; स्थैर्येण मेरोः क्षमय़ा पृथिव्याः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
कान्दिग्भूतं छिन्नगात्रं विसञ्ज्ञं; दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
कान्दिग्भूताः श्रान्तपत्रा हतास्त्रा हतचेतसः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
कान्दिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ||
४ ख