शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
आश्रमास्तात चत्वारो यथासङ्कल्पिताः पृथक् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
आश्रमे कृत्तिकानां तु स्नात्वा यस्तर्पय़ेत्पितॄन् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रमे क्रीडितं यत्तु त्वय़ा वाल्ये मय़ा सह |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
आश्रमे च सदा मह्यं सांनिध्यं परमस्तु ते ||
१८९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वय़ा सार्धं महामुने |
११४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वय़ा सार्धमहं सदा ||
४८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
आश्रमे जनितं व्रह्मन्नीतास्ते नगरं मय़ा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
आश्रमे त्वभवद्रैभ्यो भार्या चैव परावसोः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
आश्रमे यो द्विजं हन्याद्गां वा दद्यादनाश्रमे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
आश्रमे वा वने वा यो ग्रामे वा यदि वा पुरे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
आश्रमे वै वसन्त्यास्ते न भवेय़ुः पितुर्गृहे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
आश्रमेषु च ये सन्ति पुन्येष्वाय़तनेषु च ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रमेषु च रम्येषु पर्वतेषु गुहासु च ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्रमेषु महर्षीणां व्राह्मणावसथेषु च |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
आश्रमेषु यथाकालं चेलभाजनभोजनम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
आश्रमेषु यथोक्तेषु यथोक्तं ये द्विजातय़ः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
आश्रमेष्वग्निहोत्राणि ऋषीणां भावितात्मनाम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
आश्रमेष्वाश्रमेष्वेवं शिष्यो वर्तेत कर्मणा ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थेऽभवन्महान् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसभे गिरौ ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
आश्रावय़द्यथावृत्तमिरावद्वधमुत्तमम् ||
८१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रिता तं रथश्रेष्ठं शक्राय़ुधसमा शुभा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
आश्रिता धरणीं पिण्डास्तस्मात्पितर एव ते ||
१७ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
आश्रिताः श्रममोहार्ताः स्थिताः पश्य महावल ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
आश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि च ||
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
आश्रिताश्रय़योगेन पृथक्त्वेनाश्रय़ा वय़म् ||
१७८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत्सुखम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
आश्रय़ं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञो दुःखभय़ावहम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
आश्रय़ं सर्वभूतानां मनसेति विशुश्रुम |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
आश्रय़न्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
आश्रय़स्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
आश्रय़ामास भोजस्तु दुर्योधनमरिन्दमः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्रय़िष्यन्ति च नदीः पर्वतान्विषमाणि च |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
आश्रय़ो धार्तराष्ट्राणां मानी तीक्ष्णपराक्रमः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
आश्रय़ो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
आश्रय़ो नास्ति सत्त्वस्य गुणशव्दो न चेतना |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
आश्लिष्य पार्थं दाशार्हो हर्षाद्वचनमव्रवीत् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
आश्लेषाय़ां तु यो रूप्यमृषभं वा प्रय़च्छति |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
आश्लेषाय़ां ददच्छ्राद्धं वीरान्पुत्रान्प्रजाय़ते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
आश्वसध्वं न भीः कार्या सौभराडद्य नश्यति |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगय़ामहे |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
आश्वासनार्थं भवतः प्रोक्तं न श्लाघय़ा नृप ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
आश्वासनार्थं सर्वेषां सैन्यानां पाण्डुनन्दन ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
आश्वासनार्थं सुहृदां त्र्यम्वकेन समागमम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
आश्वासितः सिन्धुपतिर्मोहाद्दत्तश्च मृत्यवे ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
आश्वासितो विचित्रार्थैः पूर्वराज्ञां कथाश्रय़ैः ||
७ ख