कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतोऽर्जुनः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतोऽर्जुनः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य फल्गुनः समय़ोधय़त् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य लघुहस्तो धनञ्जय़ः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराज्ञः स कौरवः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
अस्त्रैरस्त्रेषु वहुधा हतेष्वथ च भार्गवः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
अस्त्रैरेव महावाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रिय़ाम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
वासुदेव उवाच
अस्त्रैर्वहुविधैर्दग्धः पूर्वमेवाय़मर्जुन |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
अस्त्रैश्च विविधाकारै रथौघैश्च युधिष्ठिर |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रैश्च विविधैर्घोरैस्तत्र तत्र विशां पते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
अस्त्रैश्च विविधैर्दिव्यैः पावकोल्काभिरेव च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अस्त्रैश्चाप्यन्वजानन्त सङ्ग्रामविजय़ेन च ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रय़ुद्धे ततो राजन्वर्तमाने भय़ावहे |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अस्त्रय़ुद्धे समो वीर न ते कश्चिद्भविष्यति ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अस्त्रय़ोगश्च युद्धं च निमित्तानि तथैव च |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
अस्त्विदानीमिय़ं राजन्केवला पृथिवी तव |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अस्त्वय़ं सर्वदमनः सर्वं हि दमय़त्ययम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
अस्थानक्रोधनो यश्च अकस्माच्च विरज्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
अस्थानतो हीनतः कुत्सिताद्वा; तं विद्वांसं वाधते साधुवृत्तम् |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसावृतः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
करालजनक उवाच
अस्थि स्नाय़ु च मज्जा च जानीमः पितृतो द्विज ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
अस्थिकङ्कालसङ्कीर्णा भूर्वभूवोग्रदर्शना ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
अस्थिकङ्कालसङ्कीर्णा हाहाभूतजनाकुला |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अस्थिकेशपरिस्तीर्णं शोणितौघपरिप्लुतम् |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्थिकेशसमाकीर्णं कृमिकीटसमाकुलम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अस्थिच्छिदो मर्मभिदो वमेच्छरां; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति शृङ्गैर्वालैश्च भारत ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
अस्थिरत्वं च सञ्चिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद्भय़ानकम् ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्थिशैवलसम्वाधां युगान्ते कालनिर्मिताम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
अस्थिसङ्घातसङ्कीर्णा धनुःशरवरोत्तमाः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
अस्थिसङ्घातसङ्घाटं श्लेष्मफेनमरिन्दम |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
अस्थिसञ्चय़मारूढश्चामितौजा युधिष्ठिरः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्थिसञ्चय़मारूढो भुञ्जानो मधुपाय़सम् |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
अस्थिसञ्चय़सङ्घाटा केशशैवलशाद्वला |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
अस्थिस्थूणं स्नाय़ुय़ुतं मांसशोणितलेपनम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अस्नातो व्राह्मणो राजंस्तस्याधर्मो गवानृतम् ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
अस्नानं केचिदिच्छन्ति स्नानमित्यपि चापरे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद्वहुच्छलम् ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
अस्पर्शनमशृण्वानमनास्वादमदर्शनम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
अस्पृशन्मुकुटं राज्ञः पुण्डरीकसुगन्धिना ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्त्वा प्रवेक्ष्यसि ||
१५ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४
शौनक उवाच
अस्मच्छुश्रूषणे नित्यं पिता हि निरतस्तव |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मत्कृते च सततं यय़ा दुःखानि माधव |
४० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अस्मत्तस्तदुपादाय़ दिव्यमस्त्रं यदूत्तम |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अस्मत्तस्ते भय़ं नास्ति समय़ं प्रतिपालय़ |
११५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
अस्मत्तेजोवलं यावत्तावद्द्विगुणमेव च |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अस्मत्तोऽपि गृहाण त्वमस्त्राणीति समन्ततः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
अस्मत्तोऽभ्यधिकं कर्णं मन्यमानः प्रशंससि |
२२ क