आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
स तु कालेन महता प्राप्य निष्कल्मषं तपः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
स तु कोपं समुत्सृज्य गतमन्युर्महामनाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
स तु कौरव्यमासाद्य द्रुपदस्य पुरोहितः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
स तु क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स तु क्रोधसमाविष्टो द्रोणपुत्रो महावलः |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
स तु क्रोधस्तमाहेदं प्राञ्जलिर्मूर्तिमान्स्थितः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेवानुचिन्तय़न् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
स तु गत्वा च नगरं भार्यामिदमुवाच ह ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
स तु गत्वा ततस्तत्र तीर्थमौशनसं द्विजः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
मार्कण्डेय़ उवाच
स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
स तु गर्भो महातेजा गाङ्गेय़ः पावकोद्भवः |
७५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
स तु गर्भो मृतो जातो दीर्घमाय़ुरवाप्स्यति ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स तु गाण्डीवनिर्मुक्तः शरः श्येन इवाशुगः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स तु गोवासनः शैव्यः सहितः सर्वराजभिः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स तु चित्राङ्गदः शौर्यात्सर्वांश्चिक्षेप पार्थिवान् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
स तु जग्राह तद्रेतः करेण जपतां वरः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माय़याभिजिघांसतः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
स तु ज्ञात्वा द्विजं प्राप्तं सहसा सम्भ्रमोत्थितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
स तु ज्ञानगरीय़स्त्वात्तपसश्च समन्वय़ात् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहय़ामास माय़या |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तं पूजय़ामास धृतवर्माणमाहवे |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
स तु तं प्रतिगृह्यैव पुत्रे सङ्क्रामय़िष्यति ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
स तु तं प्रतिविव्याध त्रिभिस्तीक्ष्णैरजिह्मगैः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
स तु तं प्रतिविव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
स तु तं विरथं कृत्वा स्मय़न्नत्यन्तवैरिणम् |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तं व्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः |
२८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स तु तं श्रुतकर्माणमास्ये जघ्ने वरासिना |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
धृतराष्ट्र उवाच
स तु तं सहसा प्राप्तं नित्यमत्यन्तवैरिणम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तां नैष्ठिकीं वुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तां प्रतिजग्राह मय़ः सत्कृत्य सत्कृतः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
स तु तान्प्रतिविव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स तु तान्प्रतिविव्याध पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स तु तान्सर्वतो यत्ताञ्शरैः सम्पीड्य मारिष |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
स तु तेन प्रहारेण भैमसेनिर्महावलः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स तु तेन प्रहारेण मातङ्ग इव रोषितः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
स तु तेनैव कोपेन राजन्गाङ्गेय़मुक्तवान् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
स तु तेनैव रूपेण दिवं प्राप्य व्यरोचत |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
स तु तेनैव वृक्षेण भस्मीभूतोऽभवत्तदा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तेषां वचः श्रुत्वा सैनिकान्युद्धदुर्मदान् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
स तु तैस्तैः प्रदानैश्च तपोभिर्निय़मैस्तथा |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
स तु दीनः प्रहृष्टश्च प्राह नारदमार्यकः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स तु दीर्घेण कालेन प्रत्याश्वस्तो महीपतिः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
स तु दीर्घेण कालेन वभूवातिवलो महान् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
स तु दुःशासनं वाणैर्विमुखीकृत्य पार्षतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
स तु दुःशासनं वीरः साय़कैरावृणोद्भृशम् |
३ क