अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वैश्यापुत्रेण हर्तव्याश्चत्वारोंऽशाः पितुर्धनात् |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
वैश्याय़ां चैव शूद्रस्य लक्ष्यन्तेऽपसदास्त्रय़ः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
उमो उवाच
वैश्ये किंलक्षणो धर्मः शूद्रे किंलक्षणो भवेत् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
वैश्ये च कृष्याभिरते वसामि; शूद्रे च शुश्रूषणनित्ययुक्ते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथञ्चन ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
वैश्ये न्याय़ार्जिताश्चैव शूद्रे शुश्रूषय़ार्जिताः |
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
वैश्यो गच्छेदनुज्ञातो नृपेणाश्रममण्डलम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
वैश्यो ददद्द्विजातिभ्यः पापेभ्यः परिमुच्यते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुय़ात् ||
१२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
वैश्यो धनार्जनं कुर्याच्छूद्रः परिचरेच्च तान् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुतिः ||
३२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यो लाभं प्राप्नुय़ान्नैपुणं च; शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
उमो उवाच
वैश्यो वा क्षत्रिय़ः केन द्विजो वा क्षत्रिय़ो भवेत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुय़ात् ||
१०४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
वैश्यो वैदेहकं चापि मौद्गल्यमपवर्जितम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
वैश्योऽधिगम्य द्रव्याणि व्रह्मकर्माणि कारय़ेत् ||
५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
वैश्योऽधीत्य कृषिगोरक्षपण्यै; र्वित्तं चिन्वन्पालय़न्नप्रमत्तः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
वैश्योऽधीत्य व्राह्मणान्क्षत्रिय़ांश्च; धनैः काले संविभज्याश्रितांश्च |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि; र्गोसङ्ख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
वैश्वदेवं च ये मूढा विप्राय़ व्रह्मचारिणे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
वैश्वदेवं ततः कुर्यात्पश्चाद्व्राह्मणवाचनम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
वैश्वदेवं हि नामैतत्साय़म्प्रातर्विधीय़ते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
वैश्वदेवं हि नामैतत्साय़म्प्रातर्विधीय़ते ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
वैश्वदेवमसम्वाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
वैश्वदेवी मनःपूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
वैश्वानर इव क्रुद्धः समूलमपि निर्दहेत् |
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
वैश्वानरं धूमशिखं ज्वलन्तं; तेजस्विनं लोकमिमं दहन्तम् |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
वैश्वानरं प्रज्वलितं सुघोर; मय़ुद्धेन प्रशमय़तोत्पतन्तम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
वैश्वानरं यथा दीप्तं दह्यन्ते प्राप्य वै जनाः |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
वैषम्यं हि परं भूमेरासीदिति ह नः श्रुतम् ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपाय़न्ति कुलस्त्रिय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपाय़न्ति कुलस्त्रिय़ः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
वैषम्यमर्थविद्यानां नैरर्थ्यात्ख्यापय़न्ति ते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वैषम्यादथ वा लोभात्कामाद्वापि परन्तप |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
वैष्णवं चक्रमाविद्धं विधूमेन हविष्मता ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
इन्द्र उवाच
वैष्णवानि च सर्वाणि नैरृतानि तथैव च |
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
वैष्णवी काश्यपी चेति तथैवेहाक्षय़ेति च ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
वैहारो विपुलः शैलो वराहो वृषभस्तथा |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
वैहाय़सी कामगमा पञ्चय़ोजनमुच्छ्रिता ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
वैय़ाघ्रकोशस्तु महान्भीमसेनस्य साय़कः |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
वैय़ाघ्रकोशे निहितो हेमचित्रत्सरुर्महान् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
वैय़ाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं; हैमत्रिकोशं रजतत्रिवेणुम् |
५६ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
वैय़ाघ्रपद्य विप्रेन्द्र सर्वथैव नमोऽस्तु ते ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
वोढव्ये धुर्यनडुवन्मन्ये मरणमेव तत् ||
३३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
वोढारं पितरं तस्य प्राहुः शास्त्रविदो जनाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
वोढारो हव्यकव्यानां तान्नमस्यामि यादव ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
वोद्धव्यमधिभूतं तु क्षेत्रज्ञोऽत्राधिदैवतम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
वोद्धव्यस्तादृशस्तात नरश्वानं हि तं विदुः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
वोधनात्तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत् |
२ क