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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
अमर्षितः स्वय़ं जेतुमशक्तः पाण्डवान्रणे |  १००   क
निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं श्रिय़मक्षत्रिय़ो यथा |  १००   ख
गान्धारराजसहितश्छद्मद्यूतममन्त्रय़त् ||  १००   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति