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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं देवराजं प्रवृष्टं; शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन |  १०४   क
अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति