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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं स्नातकानां सहस्रै; रन्वागतं धर्मराजं वनस्थम् |  १०८   क
भिक्षाभुजां व्राह्मणानां महात्मनां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति