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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः |  १०   क
अमूर्तय़स्ते विज्ञेय़ा आपो मूर्तास्तथा क्षितिः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति