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शान्ति पर्व
अध्याय २५७
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भीष्म उवाच
यज्ञिय़ाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः |  ११   क
यच्चापि किञ्चित्कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम् |  ११   ख
महासत्त्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवार्हमेव तत् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति