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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं श्रान्तहय़े धनञ्जय़े; मुक्त्वा हय़ान्पाय़यित्वोपवृत्तान् |  १३६   क
पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रय़ातं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति