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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
कौमाराद्यौवनं चापि स्थाविर्यं चापि यौवनात् |  १२०   क
अनेन क्रमय़ोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ||  १२०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति