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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं निहतं मद्रराजं; रणे शूरं धर्मराजेन सूत |  १४८   क
सदा सङ्ग्रामे स्पर्धते यः स कृष्णं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति